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शिशिर माह की शाम सखे ! – अनुराधा पांडेय

क्या फिर से वापस आएंगी?
वो शिशिर माह की शाम सखे!
जब मिला निमंत्रण मिलने का
पग बिन सोचे उस ओर बढ़े।
तब पलक पाँवड़े राहों में
तुम सतत बिछा थे मग्न खड़े
नैनों ने भर आह्लाद प्रिये !
तब जैसे चारों धाम लखे ।
वो शिशिर माह की शाम सखे!
क्या फिर से वापस आएंगी?
वो शिशिर माह की शाम सखे!
– अनुराधा पांडेय, द्वारिका, दिल्ली




