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साड़ी का श्रृंगार: माँ के नाम – ज्योती वर्णवाल

महिलाएँ चाहे जैसी हों, साड़ी उन पर खूब जचती है,

लगता है जैसे रेशम की डोरी, उन्हीं के लिए तरसती है।

उत्तर भारत का सीधा पल्ला, जब माँ कंधे पर लेती है,

बड़ी सी मैरून बिंदी में, वो साक्षात देवी लगती है।

बेटियाँ देख आज भी कहतीं— “माँ, कितनी सुंदर दिखती हो,”

नत और झुमकों की चमक में, तुम चाँद सा निखरती हो।

तुम्हारी नातिन गुनगुन कहती है प्यार से— “तुझ पर हर साड़ी खिलती है,”

पर बनारसी की बात निराली, जो यादें गहरी बुनती है।

वो पर्पल रंग की बनारसी, जो संगीत में माँ ने पहनी थी,

सीधे पल्ले की उस शान में, एक गरिमा छिपी पुरानी थी।

क्या छोटी-बड़ी, क्या दामाद बाबू, सबकी आँखें चकाचौंध हुईं,

देखने वालों की हर नज़र, माँ की सादगी में ही मौन हुई।

मेरी सगाई के दिन भी वही रूप, जैसे ममता का कोई सागर हो,

आँखों में काजल, माथे पर बिंदी, जैसे श्रद्धा का गागर हो।

बहू और बेटियाँ भी अब, माँ की सुंदरता का मान रखती हैं,

तीज हो या दुर्गापूजा, चंदेरी और बनारसी ही चुनती हैं।

शालीनता, शक्ति और सौंदर्य का, साड़ी एक अनूठा मिश्रण है,

दादी से भाभी और बहन तक, यह स्त्रीत्व का सुंदर अर्पण है।

लाखों बुनकरों और कारीगरों का, दिल से हम आभार करें,

जब साड़ी में सजी माँ को देख, हम ईश्वर का दीदार करें।

-ज्योती वर्णवाल, नवादा, बिहार

 

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