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सामाजिक क्रान्ति दूत, स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर – प्रताप नारायण मिश्र 

utkarshexpress.com – महापुरुष कभी नहीं मरा करते। वे मरने के बाद भी जिंदा रहते हैं। उनके विचार, आचरण, कार्य और कृतियां उन्हें इतिहास में सदैव-सदैव के लिए अमर कर देती है। उनका जीवन एक प्रकाशस्तम्भ के समान जन-जन को सही दिशा का मार्ग प्रशस्त करता है। ऐसे ही एक महापुरुषों में से थे- स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक अप्रतिम योद्धा ही नहीं थे अपितु उनके रग-रग में प्रखर हिन्दुत्व का भाव भी समाया हुआ था। साहस, निर्भीकता, दूरदर्शिता, प्रचण्ड आत्मविश्वास अनुशासन व सिद्धांतप्रियता का ऐसा अद्भुत संगम विरले ही पुरुषों में मिलता है। हिन्दू जीवन मूल्य व सामाजिक समता पर आधारित जाति, भाषा, पंथ, भेदभाव सहित-समाज, रचना के वे प्रबल समर्थक थे। ओजस्वी वक्ता और हृदय के तार-तार को झंकृत कर देने वाली लेखनी के धनी तो वे थे ही।
विश्व में एकमात्र व्यक्ति जिन्हें दो जन्मों का आजन्म कारावास
अंग्रेजों ने सन् 1910 में उन्हें दो जन्मों अर्थात् 55 वर्षों का आजन्म कालापानी का दण्ड दिया। सम्भवत: आजादी के लिए सर्वस्व होम करने वाले तथा दो जन्मों का आजीवन कारावास पाने वाले विश्व के एक वह मात्र नरपुरुष थे। अंडमान की सेल्यूलर जेल में उन पर क्या-क्या जुल्म नहीं ढाए गए। अंग्रेज तो यही समझते थे कि वे कालापानी से जीवित न लौट सकेंगे। जब आयरिश जेलर ने उनसे कहा कि मिस्टर सावरकर! क्या तुम इतने दिनों तक जीवित रहोगे? उस दृढ़वादी ने तत्क्षण उत्तर दिया मैं तो जिंदा रहूंगा ही और इन्हीं आंखों से ही देखूंगा कि हिन्दुस्तान से तब तक ब्रिटिश साम्राज्य का खात्मा हो चुका होगा। कैसा था उनमें प्रचण्ड आत्म विश्वास और दृढ़ इच्छा की संकल्प शक्ति। मानो वे उसके साक्षात मूर्ति ही हों।
संसार ने देखा इस घटना के 37 वर्षों में ही अंग्रेजों को भारत की पवित्र भूमि से अपना बोरिया बिस्तर बांधकर जाना पड़ा।
सामाजिक क्रांति के अग्रदूत
इधर देश के अन्दर श्री सावरकर जी को पुन: हिन्दुस्तान वापस लाने के लिए जनमानस उद्वैलित हो उठा। अंग्रेजों को देश विदेश के प्रबल दबाव के कारण बाध्य होकर उन्हें देश की धरती पर पुन: लाना पड़ा। सन् 1923 में कलकत्ता बन्दरगाह पर स्वदेश की भूमि पर उनके चरण पड़े। एक वर्ष अलीपुर जेल में बन्द रहकर सन् 1924 में रत्नागिरि लाकर उन्हें नजरबन्द कर दिया गया। सन् 1937 तक कांग्रेस मंत्रिमंडल बनने तक वे वहां नजरबंद रहे। अंग्रेज सरकार समझती थी कि काला पानी की यातनाओं में यह वीर टूट चुका होगा। इस परिस्थिति में उनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाकर उन्हेें अकर्मण्य बनाकर देश धर्म से अलग कर देंगे। कठिन परिस्थितियों में भी देशहित के अनुकूल मार्ग निकालकर अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना, यह उनका अपना वैशिष्ठय था। नजरबन्दी के 13 वर्ष के लम्बे कालखण्ड में उन्होंने सामाजिक क्रांति की ओर अपने को उन्मुख कर, उसके अग्रदूत बने।
वीर विनायक सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को हुआ था। उनके क्रांतिकारी जीवन, देश की स्वतंत्रता के लिए समाज में चेतना, बलिदान का भाव जगाने तथा उनके सशस्त्र संघर्ष के प्रयास एवं ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिला देने वाले उनके ज्वलन्त व्यक्तित्व पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। इसके अतिरिक्त उनके जीवन का एक पक्ष और भी है। वह है हिन्दू समाज में सामाजिक समता स्थापित करने की उनकी सामाजिक क्रान्ति। हिन्दू समाज की वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में उनके जीवन के उस पक्ष पर कुछ प्रकाश डालना अधिक समीचीन होगा।
जाति-भेद, अस्पृश्यता सामाजिक कोढ़
हिन्दू समाज ऊंच-नीच, रूढिय़ों, भाषा, जाति भेद-भाव, परम्परागत कुसंस्कारों तथा अस्पृश्यता के कोढ़ में भयंकर रूप से ग्रस्त था। उन्होंने देखा उच्च वर्णीय कुलीन घरों में कुत्ते बिल्ली बेरोकटोक प्रवेश कर सकते हैं। चारपाई पर उनकी गोद में बैठकर उनको चूम चाट भी सकते हैं, फिर भी उनकी पवित्रता नष्ट नहीं होती किन्तु अपने समाज का ही एक वर्ग तथाकथित पिछड़े हरिजन, अस्पृश्य समझे जाते हैं, वे घरों में प्रवेश नहीं कर सकते। उन्हें स्पर्श करना तो अलग रहा उनकी परछाई मात्र से ही उनकी पवित्रता खंड़ित हो जाती है। उन्हें स्नान करना पड़ता है। उनके लिए अलग बस्तियां, अलग कुएं। वे सामाजिक कुओं पर पानी भी नहीं भर सकते, क्योंकि उनसे कुआं अपवित्र हो जाता है। हिन्दू समाज में कैसी है यह विडम्बना?
अच्छे अच्छे कर्मकांडी ब्राह्मण घरों में पिछड़े परिगणित बन्धु साग-सब्जी आदि आवश्यक वस्तुएं लाते हैं लेकिन उनका घर में प्रवेश करना तो दूर रहा उनके द्वारा लाई वस्तु भी तभी घर में प्रवेश कर सकती थी जबकि वह बाहर ही धुलवाई जाए। वर्षों तक इतना बड़ा सामाजिक अपमान सहन कर भी हिन्दू जीवन से नाता न तोड़ने वाले इन समाज तिरस्कृत बन्धुओं के प्रति घोर अन्याय देख उस महामानव का हृदय चीत्कार कर उठा।
ललकार कर कहो अस्पृश्यों को छुयेंगे
उन्होंने ललकार कर कहा केवल मन में निश्चय करें कि हम अस्पृश्य को छुयेंगे, कुत्ते को छूते हो, प्रतिदिन चूहे का खून चूसने वाली बिल्ली के साथ बैठकर एक ही थाली में खाते हो तो फिर हिन्दुओं! अपने ही जैसे इन समान बांधवों जो तुम्हारे ही राम और अन्य सभी देवताओं के उपासक हैं, उन्हें छूने में किस बात की शर्म लगती है? शपथ लेकर बोलो। छुऊंगा। सार्वजनिक समारोहों में उन्हें अपने पास बैठने दूंगा। यह उन्होंने उस समय कहा जब छुआछूत घर-घर में व्याप्त थी। रत्नागिरि में उन्होंने पतित पावन मंदिर बनवाया जिसमें हिन्दू-हिन्दू में परस्पर कोई भेदभाव नहीं था। अस्पृश्य सीना तानकर गर्व के साथ मंदिर में अर्चना करता, कहता कि राम हमारे हैं, हम उनके हैं। तथाकथित सवर्ण और अस्पृश्य बंधुओं का भगवान पतित-पावन के चरणों में बैठ साथ-साथ सहभोज होता। सम्पूर्ण महाराष्ट्र में झुनका भाखरी (एक प्रकार की रोटी बेसन) के सहभोज का आंदोलन चलाकर सावरकर ने इसे चरितार्थ किया।
किसी हिन्दू ने ईसाई या मुसलमान का छुआ अन्न खा लिया तो वह धर्म भ्रष्ट हो गया। करोड़ों समाज बंधु, इन्हीं रूढ़ियों के शिकार हो विधर्मियों की गोद में फैंक दिए गए। धर्म की यह विकृत कल्पना मूर्खता पूर्ण है, क्योंकि धर्म का स्थान हृदय है पेट नहीं। मुसलमानों का भोजन करने से हमारा धर्म नष्ट नहीं होता। अब हमें अगस्त्य के समान सक्षम तेजस्वी समाज की पाचन शक्ति को प्रदीप्त करना होगा, उन्होंने यह उद्घोष किया, समाज के करोड़ों बंधुओं के अन्दर से इस भ्रामक कल्पना को जड़ से निर्मूल कर अपने धर्म में पुन: वापिस लेकर। परिगणित बंधुओं को सामाजिक समता प्राप्ति करानी होगी। स्वामी श्रद्धानन्द जिस कार्य के लिए मजहबी उन्माद का शिकार बन शहीद हो गए। उनके द्वारा प्रणीत शुद्धि आंदोलन को सावरकर ने तेज गति प्रदान की। शुद्धि समारोहों के आयोजन किए। सामाजिक विकृति स्वरूप उत्पन्न सात बेड़ियों (जंजीरों) को तोड़ने का उन्होंने राष्ट्र को आह्वान किया। वे सात बेडिय़ां जिनसे हिन्दू समाज जकड़ा हुआ था वे हैं – वेद पठन-पाठन बन्दी, समुद्र यात्रा बन्दी, शुद्धि बन्दी, रोटी बन्दी, संबंध बंदी। बिना भेद भाव के हिंदू मात्र के लिये वेदों का पठन-पाठन समाजोपयोगी है व्यवसाय नहीं। सभी का समान अधिकार हो।
अस्पृश्य-स्पृश्य के भेदभाव रहित समाज रचना करने, मंदिर में प्रवेश, परस्पर रोटी-बेटी संबंध, एक बार जो हिन्दू अन्यायपूर्वक छल कपट से धर्मान्तरित किया गया, उसे पुन: हिन्दू धर्म प्रवेश का उन्होंने अभियान चलाया।
किसी उच्च कुल में जन्म ले लेने मात्र से व्यक्ति को पूज्य या सिरहाने बैठने का हक मिल जाता है किन्तु उसे किसी को पैताने बैठने का भी अधिकार नहीं। यह अन्याय है। भारतीय शास्त्रानुसार जन्मना जाति व्यवस्था कभी नहीं थी वह कर्मणा थी। यदि ऐसा न होता तो सन्त वाल्मीकि, रैदास, तुकाराम आदि परगणित कुल में जन्म लेने के बाद भी ये महर्षि संत के रूप में क्यों पूजे जाते हैं? उच्च ब्राह्मणकुलोत्पन्न रावण राक्षस क्यों कहलाता? व्यक्ति अपने सुकर्मों व कुकर्मों से अच्छा व बुरा बनता है। महामानव सावरकर ने इन सामाजिक दोषों को दूर कर समाज को एक होने का आह्वान किया। आज भी उनके द्वारा चलाये गये कार्य को आगे बढ़ाने की अनिवार्य आवश्यकता है।
दिनांक 26 फरवरी, 1966 है उस कालजयी के महाप्रयाण की पुण्य तिथि। इस जीवन का कार्य समाप्त हो गया यह आभास होने पर स्वेच्छा से अन्न जल त्याग कर, काल के समक्ष आत्मार्पण करने वाले वह एक अनोखे राष्ट्र पुरुष थे। आइये,उस तेज वीर राष्ट्रभक्त को स्मरण कर उनके ज्वलंत जीवन और कार्य से प्रेरणा लें, हम उनके द्वारा दिखाये मार्ग पर सतत आगे बढ़ते जायें। (विनायक फीचर्स) पुण्यतिथि: 26 फरवरी

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