मनोरंजन

सून–सुना – प्रदीप सहारे

धनतेरस के दिन,
मैंने लक्ष्मी माँ से,
“गुलाम” फ़िल्म के गुलाम की तरह पूछा —
“लक्ष्मी माँ, सून…”
वह बोली —
“बेटे, सूना…”

मैं बोला —
रात-दिन बजा रही है,
सरकार जी.एस.टी. का तुनतुना़।
रेडियो, टीवी, अख़बार, फ्लेक्स —
चारों तरफ़ एक ही गाना —
“जी.एस.टी. कम होना,
अब महँगाई का न रोना।”

क्या सच में बदल गया,
तेरा पैमाना या?
अभी भी चल रहा है,
भ्रष्टाचारियों के यहाँ
तेरा आना-जाना?

वह बोली —
“नहीं बेटा,
सिर्फ़ राजा ईमानदार होना काफ़ी नहीं,
ना मैं बदली, ना ज़माना।
चल रहा है ऊपर से नीचे तक
मेरा आना-जाना।

इसीलिए ‘हाउसफुल’ चल रहे हैं,
सबके सब काउंटर —
सुनार, कार, मॉल, बाज़ार,
चारों तरफ़ भीड़ धुआँधार,
मज़े में चल रहा कारोबार।

तुझे क्या!
तू बैठ घर में,
महँगाई का बजा
अपना तुनतुना़।
अब मुझे न कर बोर!”

मैं बोला —
“माँ, मैं न करूँगा बोर,
मैं भी चाहता हूँ,
चलता रहे तेरा ये दौर।
बस एक नज़र रखना —
‘दीपावली की शुभकामनाएँ’
देने वालों की ओर।

रखना हर घर सुख-समृद्धि से भरा,
आनंद में रहे सदा हर मन।
खुशियाँ नाचें सदा आँगन ,
शुभकामनाएँ देता है अंतरमन।”
– प्रदीप – संजीवनी सहारे, नागपुर,महाराष्ट्र

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