मनोरंजन
हमें रोजगार चाहिए- अशोक यादव

किताबी कीड़ा और रट्टू तोता बनकर की पढ़ाई।
दिन, महीने, साल बीते लेकिन नौकरी नहीं आई।।
जाग उठा जमीर, बदनसीबी भी हुंकारने लगी है।
दु:ख के बादल छा गए, खुशी पुकारने लगी है।।
पिता के ताने, पड़ोसियों की हँसी लगे हैं चुभने।
छोटी-छोटी बातों से हमारा दिल लगे हैं दुखने।।
जनता के बेटे और बेटियाँ भटक रहे हैं दर-बदर।
शक्ति की कुर्सी में बैठी सरकार हो गई है बेखबर।।
बेगारों का ना आँसू दिखा, ना दिखा दर्द कभी।
आस लगाए देख रहे हैं तेरी ओर गरीब सभी।।
तुझे राजनीति मुबारक, हमें पद का सौगात चाहिए।
खोलो नौकरी का पिटारा, जल्द ही आगाज चाहिए।।
अब ना घोषणा, ना वादा, ना बेरोजगार चाहिए।
जीवन जीने के लिए हमें सिर्फ रोजगार चाहिए।।
– अशोक कुमार यादव मुंगेली, छत्तीसगढ़




