हम ही आधार हैं – श्याम किशोर

हम कायर नहीं थे…
हम सृजनकर्ता थे.
जब दुनिया सत्ता और स्वार्थ में उलझी थी,
हम चमड़े से जूते गढ़ रहे थे,
बाँस से सभ्यता बुन रहे थे,
लोहे को औज़ार बनाकर भविष्य गढ़ रहे थे.
हम मिट्टी और पत्थरों से
बर्तन गढ़ रहे थे,
मूर्तियों में प्राण फूँक रहे थे,
संस्कृति को आकार दे रहे थे.
हम कपड़े बुन रहे थे-
धागों में श्रम,
करघे में आत्मा,
और वस्त्रों में मर्यादा सी रहे थे.
हमने पशुपालन किया,
दूध से मिठास रची,
सब्ज़ियाँ उगाईं,
मछलियाँ पालीं,
वाद्ययंत्र बनाए और सुर साधे,
लकड़ी से घर खड़े किए,
धरती को रहने योग्य बनाया.
हमारी सुबह से रात तक
हर क्षण राष्ट्र-निर्माण में जलता रहा
लेकिन…
हमारी विनम्रता को कायरता कहा गया.
हमारे श्रम को “नीच” कहा गया.
हमारे हाथों पर टिका समाज
हमें ही सबसे नीचे ठेलता रहा.
हमसे शिक्षा छीनी गई,
अवसर रोके गए,
सम्मान कुचला गया-
क्योंकि हम चुपचाप निर्माण करते रहे.
अब सुन लो-
हम झुकते थे, टूटते नहीं.
हम शांत थे, शक्तिहीन नहीं.
वक्त बदलेगा.
जब श्रम का अपमान करने वाले
हमारी कृतियों पर निर्भर खड़े मिलेंगे.
जब देश का वैभव गिना जाएगा,
तो उसमें हमारा पसीना भी चमकेगा.
हमें शिक्षा दो, अवसर दो-
फिर देखो,
हम इतिहास नहीं, भविष्य गढ़ेंगे.
हम मेहनतकश हैं,
हम ही निर्माण हैं,
हम ही आधार हैं-
और आधार को अनदेखा कर
कोई भी महल नहीं टिकता ?
©श्याम किशोर समाजसेवी, मुजफ्फरपुर (बिहार)




