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हिंदी कविता – रेखा मित्तल

शाँत गम्भीर-सी यह झील
मुझे रोज नई दिखाई देती हैं
सुबह की ताजगी लिए
लालिमा लिए सिंदूरी-सी
झील में झाँकता हुआ सूर्य
पानी में प्रतिबिंबित दृश्य
मनमोहक और सुकून देता हुआ
रंग बदलती हुई यह झील
मुझे रोज नई दिखाई देती हैं
बादलों में जंग छिड़ी आज
तो झील का भी रंग बदल गया
आज कुछ धुँधली-सी,
स्थिर, कोई हलचल नहीं
शायद मेरे बेचैन मन की तरह
थोड़ी हैरान, परेशान-सी
कुछ कहने को आतुर
पर व्यक्त नही कर पा रही व्यथा
मुझे रोज नई दिखाई देती हैं
संध्या के वक्त,कुछ ओर
रंग लिए इठलाती अपने वजूद पर
सुरमई सी,पर नजाकत लिए
करती स्वागत पथिक का
बतखें भी कर रही कलोल
एक दूसरे के पीछे भागती हुई
कुछ कश्तियाँ भी चल रही
अपनी मंजिल तलाशते हुए
पर रंग बदलती हुई यह झील
मुझे रोज नई दिखाई देती हैं
– रेखा मित्तल, चण्डीगढ़




