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हिचकी जब आई – नीलांजना गुप्ता

 

हिचकी है सासों का बन्धन,

हिचकी अन्तस् का स्पंदन

जब याद प्रिये तुम आये तो

हिचकी अधरों में डोल गई

उर के अवगुंठन खोल गई

 

हिचकी प्रियतम की पाती है

जब आती मन भरमाती हैं

कैसे होंगे साजन मेरे

उर में शंका उपजाती है

पतझड़ सी सूनी साँसों में

सावन सा मधुरस घोल गई

उर के अवगुंठन खोल गई

 

हिचकी का यूँ आना जाना

है मीत मगर यह अनजाना

अदृश्य रूप बन छा जाते

नयनों में बिम्ब उतर आते

चिरपरिचित यादों के पट को

साजन बन घूँघट खोल गई

 

हिचकी उस दिन भी आएगी

सौगात मौत की लाएगी

देह गेह बन्धन से मुक्त कर

प्रभु से मिलन कराएगी

निज कर्मों का लेखा जोखा

है हिये तराजू तोल गई

अवगुंठन सारे खोल गई

हिचकी अधरों में डोल गई।

– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

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