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हे कलम उठो – नीलांजना गुप्ता

हे कलम उठो कुछ सृजन करो!

पहचानो उन जयचन्दों को

चिन्हित कर दो सब द्वन्दों को

भारत का स्व है जाग रहा

उग रहा सूर्य तम भाग रहा

उस शौर्य, त्याग व साहस का,

स्वालम्बन का तुम हवन करो

हे कलम उठो कुछ सृजन करो!

 

उपवन सुगन्ध से सुरभित हो

हर हृदय खुशी से प्रमुदित हो

न छीने कलियों का पराग

गुंजित हो भ्रमर का प्रेमराग

न जनने पाये रक्तबीज

रणचण्डी बनकर शमन करो

हे कलम उठो कुछ सृजन करो!

 

करने है बहुत कुछ काम यहाँ

है कर्मभूमि विश्राम कहाँ

धुँधला परिवेश बदलना है

उजले रंगों को भरना है

रह न जाये कुछ शेष यहाँ

करने हैं नव उद्घोष यहाँ

सोया समाज फिर जाग्रत हो

परिच्छिन्न निशा का दमन करो

हे कलम उठो कुछ सृजन करो!

-नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

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