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हो चिरंतन गीत मेरे – अनुराधा पांडेय

आज तुम दो छू अधर से ।
हो चिरंतन गीत मेरे ।
आज अति सूना गगन सा,
चिर अकेला। रूक्ष। मन है ।
वेदना से पूर्ण जीवन –
आज बिल्कुल बिद्ध तन है ।
आज पायल की झनक से-
बंद्य कर संगीत मेरे ।
हो चिरंतन गीत मेरे।
छीन लेता जग हमेशा ,
जो मुझे प्यारा रहा है ।
जग विजित होता रहा यह ।
और मन हारा रहा है ।
जीत दे निज हार दिल अब –
रे ! हृदय के मीत मेरे ।
हो चिरंतन गीत —
प्रीत में होता कहाँ है-
जन्म का बंधन कहो ! तो ?
उम्र की सीमा कहाँ मन ,
मानता सीमन कहो ! तो ?
रीत को मत प्रीत समझो –
दूर कर भवभीत मेरे ।
हो चिरंतन गीत —
प्यार को दे साँस अपनी,
कर अजर अब प्राण उर को ।
रीत को कर लो अमर अब,
हे ! अटल अभिज्ञान उर को ।
रीत को नव रौशनी दे –
कर अमर मनमीत मेरे ।
हो चिरंतन गीत मेरे ।
आज तुम दो छू अधर से ।
-अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली




