मनोरंजन

बारिश शुरू होते ही – रुचि मित्तल

 

खिड़की की सलाखें बोलने लगती हैं।

भीतर कहीं

एक सूखा पेड़

भीगने लगता है

बिना पत्तों के

बिना छांव के।

सड़क पर

पानी बहता है

जैसे कोई बात

जो दिल से निकली थी

मगर कानों तक नहीं पहुँच पाई।

छतों से टपकती बूँदें

समय को गिनती हैं

ठीक वैसे ही

जैसे यादें

जो कभी पूरी नहीं हुईं

और कभी पुरानी भी नहीं हुईं।

एक बच्चा

कीचड़ में कागज़ की नाव बहाता है।

उसे नहीं पता

कि नाव कहाँ जाएगी

जैसे हमें नहीं पता

कि कोई रिश्ता

कब डूब जाएगा

या बच जाएगा।

बरसात

केवल आसमान से नहीं गिरती

कभी-कभी

हमारी आँखों से भी गिरती है

बिना आवाज़ के

बिना आहट के।

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button