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अनहद – सविता सिंह

सब कहते हैं!”

कविता वही है

जो विधान-संवत हो,

जो छंदों में गढ़ी जाए,

जहाँ मात्राएँ सही बैठें,

हर स्थान पर यति ठहरी हो।

और मैं स्वयं से पूछती हूँ

पर तुम तो अनहद हो।

तुम्हें छंद में, मात्रा में

कैसे समेट लूँ?

तुम्हें नियमों की डोर में

कैसे बाँध दूँ,

जब तुम स्वयं ही

अनगढ़, मुक्त और अपार हो?

कम शब्दों में

तुम्हें कैसे कहूँ मैं?

तुम्हारी परिभाषा को

किस परिभाषा में रखूँ मैं?

इसीलिए तुम असीमित हो

छंदों में कहे नहीं जाते।

अब मैं उस अवस्था में हूँ

जहाँ सरिता स्वयं

समंदर के पास जाती है,

दोनों किनारों को त्यागकर

अनंत, असीम होने।

अब छंद की विधाएँ

मेरे लिए अपर्याप्त हैं—

क्योंकि

कुछ अनुभूतियाँ

कविता नहीं,

स्वयं कवि हो जाती हैं।

– सविता सिंह मीरा,जमशेदपुर

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