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ग़ज़ल (हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

राह से भटकी हुई तुमने नदी देखी है क्या ?
इस सदी सी बेहया कोई सदी देखी है क्या ?
कीट रेशम के उबाले ही गए हैं सर्वदा ,
कॉकरोचों के सरीखी खलबली देखी है क्या ?
देख लो गंगा किनारों पर बने होटल बहुत,
नीर में अपशिष्ट बहता ज़्यादती देखी है क्या ?
राम के घर में अकेले ही विराजित राम जी ,
साथ मंदिर में किसी ने जानकी देखी है क्या ?
नेकियां देखी हैं केवल आपने इस संघ की ,
राम मंदिर में हुई जो वो बदी देखी है क्या ?
मौत भी हैरान थी मंदाकिनी को देख के ,
आजतक केदार जैसी त्रासदी देखी है क्या ?
तुम पिलाते ही रहे हो ख़ून ‘ हलघर’ छंद को ,
केश अपने धो सके वो द्रोपदी देखी है क्या ?
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून



