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दामन और गवाही – अमित कुमार

ऐ साहेब अगर है दाग़ दामन पर, सफ़ाई किस लिए,

गर बेदाग़ है ये किरदार, तो गवाही किस लिए।

सच की राह पे चलते हैं, सिर झुकाते नहीं,

झूठ के बाज़ार में हम, खुद को बेचाते नहीं।

सियासत के रंगों में रिश्ते रंग जाते हैं,

अपने ही कभी अपनों से जंग कर जाते हैं।

खानदानी नामों से कुछ नहीं होता यहाँ,

कर्म से ही इंसान ऊँचा उठ पाता है जहाँ।

छोटी बातों से दिलों में दरारें न डालो,

रिश्तों की नींव को यूँ कमज़ोर न बनाओ।

ऐ साहेब अगर है दाग़ दामन पर, सफ़ाई किस लिए…

अजीब लोग हैं, बातों को पकड़ लेते हैं,

इंसानों को छोड़, बस शिकवे गिन लेते हैं।

नसीब बदले तो चेहरे भी बदल जाते हैं,

खामोश लब भी फिर ताने उछाल जाते हैं।

हम तो खड़े रहे हर आँधी के सामने,

सच की शमा जली है दिल के आशियाने में।

(सेतु)

जो कद के बराबर आ न सके कभी,

वो पैरों तले ज़मीं खोदते रहे सभी।

पर सच की नींव गहरी होती है बहुत,

झूठ की इमारत गिरती है पल में ही स्वतः।

( समापन)

ऐ साहेब अगर है दाग़ दामन पर, सफ़ाई किस लिए,

गर बेदाग़ है ये किरदार, तो गवाही किस लिए।

रिश्ते संभालो प्यार से, यही है बंदगी,

इंसानियत से बड़ी नहीं कोई ज़िंदगी।

-अमित कुमार बिजनौरी, बिजनौर, उत्तर प्रदेश

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