दो-दो हिन्दुस्तान – डॉ. सत्यवान सौरभ

आधा भूखा है मरे, आधा ले पकवान,
एक देश में देखिए, दो-दो हिन्दुस्तान॥
महलों में उत्सव सजे, झोपड़ियाँ वीरान,
सत्ता के गलियार में, गूँजे केवल गान।
रोटी को तरसे कई, कई करें अपमान—
एक देश में देखिए, दो-दो हिन्दुस्तान॥
किस्मत लेकर खेत में, निकला रोज़ किसान,
मेहनत उसकी लूटते, घर बैठे धनवान।
बूंद पसीने की सदा, लुटकर हो वीरान —
एक देश में देखिए, दो-दो हिन्दुस्तान॥
शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, बन बैठे व्यापार,
निर्धन की हर आस पर, बैठा भ्रष्टाचार।
यूँ सपनों की लाश पर, सजता नया विधान—
एक देश में देखिए, दो-दो हिन्दुस्तान॥
जाति-धर्म की आग में, जलता जन-विश्वास,
नेता अपनी रोटियाँ, सेंके आकर पास।
जनता बस गिनती रही, बस टूटे अरमान—
एक देश में देखिए, दो-दो हिन्दुस्तान॥
बदलो ये हालात तुम, जागो अब इंसान,
रोटी, कपड़ा, घर मिले, सबको एक समान।
सच्चे लोकतंत्र का, तब होगा सम्मान—
एक देश में देखिए, दो-दो हिन्दुस्तान॥
✍ — डॉ. सत्यवान सौरभ, 333, परी वाटिका,
कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा




