मनोरंजन

पीड़ा से जग अनजाना – सीमा शुक्ला

डाली से टूटी लतिका की

पीड़ा से जग अनजाना।

देखा किसने तरुणाई में

कलियों का ओ मुरझाना।

दीप करे जगमग उजियारा

नित्य जली पर बाती है।

देकर जग अनमोल मोतियां,

निज को सीप मिटाती है।

प्रेम विबस हो परवाने की

पीर असह है जल जाना।

देखा किसने तरुणाई में

कलियों का ओ मुरझाना।

अरमानों को ले मुसकाया

मंहकाऊंगा नित्य चमन।

किन्तु चुभन की निठुर वेदना

सहकर बनता हार सुमन।

कहां सुनें तुम मूक सिसकियां

नित सपनों का बह जाना।

देखा किसने तरुणाई में

कलियों का ओ मुरझाना।

निज आलय से बिलग हुए

जब टूटे व्योम सितारें है

तब मन्नत की आस लगाए

लाखों हाथ पसारे है।

जीवन में हर ग़म पी लेना

बस अधरों से मुस्काना।

किसने देखा तरुणाई में

कलियों का ओ मुरझाना।

-सीमा शुक्ला अयोध्या, उत्तर प्रदेश

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