शिक्षा

प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव में कमजोर होती शैक्षणिक नींव – डॉ. प्रियंका सौरभ

neerajtimes.com – आज का युवा एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां अवसरों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन अवसरों तक पहुंचने का रास्ता पहले से कहीं अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धात्मक हो गया है। विशेष रूप से सरकारी नौकरियों के क्षेत्र में प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संख्या, उनकी लंबी प्रक्रियाएं और अनिश्चित परिणामों ने छात्रों और अभिभावकों दोनों को गहरी दुविधा में डाल दिया है। सीईटी (सामान्य पात्रता परीक्षा) को इसी संदर्भ में एक बड़ी उम्मीद के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन बीते वर्षों के अनुभव इस उम्मीद पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।
हरियाणा में 2019 से 2024 के बीच पांच वर्षों की अवधि में इस परीक्षा की प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी। स्थिति यह रही कि इस दौरान केवल एक ही परीक्षा पूरी तरह संपन्न हो पाई, और उससे जुड़ी कुछ भर्तियां आज भी न्यायिक प्रक्रिया में उलझी हुई हैं। 2024-25 के चक्र में भी अभी तक केवल प्रारंभिक परीक्षा ही आयोजित हो सकी है। जिस धीमी गति से पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं है कि अंतिम परिणाम आने में अभी लंबा समय लग सकता है।
लेकिन यह समस्या केवल हरियाणा तक सीमित नहीं है। देश के लगभग सभी राज्यों में सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं की स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक और यहां तक कि पूर्वोत्तर राज्यों में भी भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक, न्यायिक विवाद और परिणामों में विलंब जैसी समस्याएं लगातार सामने आती रही हैं। कई राज्यों में परीक्षाएं वर्षों तक आयोजित ही नहीं होतीं, और जब होती हैं तो उनकी प्रक्रिया इतनी लंबी होती है कि उम्मीदवारों की उम्र और धैर्य दोनों की परीक्षा लेने लगती है।
इसका सबसे बड़ा असर युवाओं के मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक जीवन पर पड़ता है। हर वर्ष लाखों छात्र स्नातक होकर रोजगार की तलाश में निकलते हैं, लेकिन उपलब्ध सरकारी पदों की संख्या बेहद सीमित रहती है। उदाहरण के तौर पर, यदि पूरे देश में लाखों अभ्यर्थी किसी एक परीक्षा में बैठते हैं, तो चयनित होने वालों की संख्या हजारों में ही सिमट जाती है। ऐसे में केवल सरकारी नौकरी को ही अंतिम लक्ष्य मान लेना और उसी पर निर्भर रहना एक अत्यंत जोखिमपूर्ण निर्णय बन जाता है।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे चिंताजनक पहलू “नॉन-अटेंडिंग” कल्चर का तेजी से फैलना है। देश के लगभग हर राज्य में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की नियमित कक्षाओं से दूरी बना लेते हैं। वे यह मान लेते हैं कि सफलता पाने के लिए उन्हें पूरी तरह से पारंपरिक शिक्षा प्रणाली से अलग होना होगा। लेकिन यह सोच धीरे-धीरे उनके भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो रही है।
वास्तव में, कॉलेज जीवन केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं होता। यह वह समय होता है जब एक छात्र का बौद्धिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास होता है। कक्षा में भागीदारी, शिक्षकों से संवाद, समूह चर्चा, प्रस्तुतियां और सह-पाठयक्रम गतिविधियां—ये सभी मिलकर एक व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती हैं। जब छात्र इन सभी से दूर हो जाते हैं, तो वे केवल विषय ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन के आवश्यक कौशलों से भी वंचित रह जाते हैं।
नॉन-अटेंडिंग कल्चर का एक और गंभीर दुष्प्रभाव यह है कि छात्रों की शैक्षणिक नींव कमजोर हो जाती है। वे विषयों को गहराई से समझने के बजाय केवल परीक्षा पास करने तक सीमित रह जाते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होने के बाद उनके पास न तो मजबूत अकादमिक रिकॉर्ड होता है और न ही कोई वैकल्पिक करियर विकल्प। परिणामस्वरूप वे आत्मविश्वास खो बैठते हैं और मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज का समय तकनीकी रूप से अत्यंत उन्नत है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। देश के हर कोने में ऑनलाइन कोचिंग, वीडियो लेक्चर, डिजिटल नोट्स, टेस्ट सीरीज और वर्चुअल क्लासरूम की सुविधा उपलब्ध है। ऐसे में यह कहना कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कॉलेज छोड़ना आवश्यक है, पूरी तरह से गलत धारणा है। छात्र अपनी नियमित पढ़ाई के साथ-साथ भी प्रभावी ढंग से तैयारी कर सकते हैं।
यदि एक संतुलित और व्यावहारिक रणनीति अपनाई जाए, तो छात्र अपनी स्नातक शिक्षा के तीन वर्षों का सर्वोत्तम उपयोग कर सकते हैं। प्रथम वर्ष में उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करते हुए सामान्य ज्ञान, समाचार पत्रों और समसामयिक घटनाओं से जुड़ना चाहिए। यह उनकी बौद्धिक नींव को मजबूत करता है। द्वितीय वर्ष में वे गणित, रीजनिंग और भाषा जैसे विषयों पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं। साथ ही, एनसीईआरटी की पुस्तकों के माध्यम से अपनी मूलभूत अवधारणाओं को स्पष्ट कर सकते हैं। अंतिम वर्ष तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें यह स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए कि वे उच्च शिक्षा की ओर बढ़ना चाहते हैं या प्रतियोगी परीक्षाओं की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
देश के विभिन्न राज्यों में उच्च शिक्षा और निजी क्षेत्र के अवसर भी तेजी से बढ़ रहे हैं। आईटी, मैनेजमेंट, हेल्थकेयर, स्टार्टअप्स, स्किल-बेस्ड जॉब्स और फ्रीलांसिंग जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए दरवाजे खुल रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि छात्र केवल सरकारी नौकरियों तक ही अपने विकल्प सीमित न रखें, बल्कि अपने कौशल और रुचि के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में संभावनाएं तलाशें।
अभिभावकों की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। अक्सर देखा जाता है कि बच्चे अपने दोस्तों या समाज के दबाव में आकर नॉन-अटेंडिंग रहने का निर्णय लेते हैं और अभिभावक उन पर भरोसा करके उन्हें इसकी अनुमति दे देते हैं। लेकिन यह आवश्यक है कि अभिभावक इस निर्णय के दीर्घकालिक प्रभावों को समझें और अपने बच्चों को संतुलित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करें। केवल एक परीक्षा या एक करियर विकल्प पर निर्भर रहना समझदारी नहीं है।
आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में सफलता उन्हीं को मिलती है, जो लचीलापन अपनाते हैं और अपने लिए कई विकल्प खुले रखते हैं। एक छात्र के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी शैक्षणिक योग्यता को मजबूत बनाए, साथ ही कौशल विकास पर भी ध्यान दे। संचार कौशल, तकनीकी दक्षता, समस्या समाधान क्षमता और आत्मविश्वास—ये सभी गुण उसे जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने में सहायता करते हैं।
अंततः यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि सीईटी (सामान्य पात्रता परीक्षा) या कोई भी प्रतियोगी परीक्षा केवल एक अवसर है, न कि जीवन का अंतिम लक्ष्य। इसे जीवन का एक हिस्सा मानकर चलना चाहिए, न कि संपूर्ण आधार। यदि छात्र अपनी पढ़ाई, कौशल और व्यक्तित्व विकास पर समान रूप से ध्यान दें, तो वे न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं।
समय की मांग यही है कि हम एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाएं—जहां तैयारी भी हो और शिक्षा भी, लक्ष्य भी हो और विकल्प भी। तभी हमारे युवा न केवल नौकरी की दौड़ में सफल होंगे, बल्कि एक मजबूत, आत्मनिर्भर और जागरूक नागरिक के रूप में देश के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकेंगे।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा) – 125005, मोबाइल: 7015375570

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