धर्म

महाशिवरात्रि: शिवतत्व के जागरण का महापर्व – विजय कुमार शर्मा

vivratidarpan.com – महाशिवरात्रि का नाम आते ही जनमानस में एक प्रश्न सहज उठता है कि यह पर्व शिवजी के जन्म से जुड़ा है या उनके विवाह से। लोकपरंपराओं में दोनों मान्यताएँ प्रचलित हैं, कहीं इसे शिव विवाह के रूप में मनाया जाता है तो कहीं शिव के प्राकट्य की कथा कही जाती है किंतु शास्त्रीय और दार्शनिक दृष्टि से महाशिवरात्रि का महत्व इन दोनों सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक और गूढ़ है। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं, बल्कि शिवतत्व के जागरण की रात्रि है, आत्मचेतना को प्रकाशित करने का अवसर है, और सृष्टि के मूल रहस्य को समझने की साधना है।
शिवपुराण में वर्णित लिंगोद्भव की कथा इस रात्रि के मूल अर्थ को स्पष्ट करती है। कहा गया है कि एक समय ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। उसी क्षण उनके सामने एक अनंत अग्निस्तंभ प्रकट हुआ जिसका न आदि दिखाई देता था न अंत। ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर की ओर चले और विष्णु वराह बनकर नीचे की ओर, किंतु किसी को भी उस ज्योति का छोर नहीं मिला। अंततः दोनों ने स्वीकार किया कि यह अनंत प्रकाश ही परम सत्य है। यही अनंत ज्योति शिव के रूप में प्रतिष्ठित हुई और आगे चलकर शिवलिंग के रूप में पूजित होने लगी। इसी घटना को महाशिवरात्रि की रात्रि माना गया। इसलिए यह दिन शिव के जन्म का नहीं, बल्कि उनके अनादि अनंत स्वरूप के साक्षात्कार का प्रतीक है।
लोकमान्यता में महाशिवरात्रि को शिव और पार्वती के विवाह से भी जोड़ा जाता है। हिमालय की पुत्री पार्वती ने कठोर तपस्या कर शिव को पति रूप में प्राप्त किया। यह कथा शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। कई स्थानों पर इस दिन विवाह की झांकियाँ सजाई जाती हैं, बारात निकाली जाती है और विवाहोत्सव मनाया जाता है। यह परंपरा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि शिव बिना शक्ति के और शक्ति बिना शिव के अधूरी है। दोनों का मिलन ही सृष्टि के संचालन का आधार है। किंतु यह भी एक प्रतीकात्मक व्याख्या है, जिसका उद्देश्य दार्शनिक सत्य को सरल लोक रूप में प्रस्तुत करना है।
दर्शन की दृष्टि से महाशिवरात्रि उस मौन, गहन और आध्यात्मिक रात्रि का संकेत है जब सृष्टि के आरंभ से पूर्व केवल शिवतत्व की निःशब्द उपस्थिति थी। शिव का अर्थ ही है कल्याणकारी चेतना। जब समस्त क्रियाएँ, विचार और विक्षेप शांत हो जाते हैं, तब भीतर वही शिवतत्व जागृत होता है। महाशिवरात्रि का उपवास, रात्रि जागरण, जप और ध्यान इसी जागरण की प्रक्रिया है। यह साधक को बाहरी संसार से हटाकर भीतर की यात्रा पर ले जाता है।
इस रात्रि का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह अमावस्या से पूर्व की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी होती है। चंद्रमा इस दिन अत्यंत क्षीण अवस्था में होता है। चंद्र मन का प्रतीक है। जब मन की चंचलता न्यूनतम होती है, तब ध्यान और साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ अवसर प्राप्त होता है। शिव के मस्तक पर स्थित चंद्रमा यह संदेश देता है कि मन को नियंत्रित कर ही शिवतत्व को अनुभव किया जा सकता है। इसलिए इस रात्रि में ध्यान और जप का विशेष महत्व बताया गया है।
महाशिवरात्रि केवल पूजा अनुष्ठान का दिन नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सत्य को समझने का अवसर है। शिवलिंग की पूजा का अर्थ किसी आकृति की उपासना नहीं, बल्कि उस निराकार, अनंत और असीम चेतना का स्मरण है जो हर कण में व्याप्त है। जलाभिषेक का अर्थ है अपने अहंकार को शीतल करना। बिल्वपत्र अर्पण का अर्थ है तीन गुणों सत्व, रज और तम को संतुलित करना। धतूरा और भस्म यह संकेत देते हैं कि जीवन के विष और वैराग्य को स्वीकार कर ही आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
महाशिवरात्रि का संदेश अत्यंत सरल किंतु गहरा है। यह हमें बाहरी उत्सव से अधिक आंतरिक उत्सव की ओर ले जाती है। यह बताती है कि शिव कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। जागरण का अर्थ पूरी रात जागना भर नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान की ओर जागना है। उपवास का अर्थ केवल भोजन त्यागना नहीं, बल्कि इंद्रियों के आकर्षण से स्वयं को विरत करना है।
इस प्रकार महाशिवरात्रि को केवल शिव जन्म या शिव विवाह तक सीमित करना इसके वास्तविक अर्थ को छोटा करना है। यह पर्व शिव के अनंत स्वरूप के प्राकट्य की स्मृति है, शिव और शक्ति के दिव्य संतुलन का प्रतीक है, और साधक के भीतर शिवतत्व के जागरण का अवसर है। यह वह रात्रि है जब मन शांत होता है, आत्मा जागती है और साधक अपने भीतर के शिव से साक्षात्कार करने की दिशा में अग्रसर होता है।
महाशिवरात्रि इसलिए महापर्व है क्योंकि यह हमें बाहर की कथा से भीतर की अनुभूति तक ले जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि शिव कोई घटना नहीं, एक अनुभव हैं, कोई व्यक्तित्व नहीं, एक चेतना हैं,कोई जन्म या विवाह नहीं, बल्कि अनंत और अविनाशी सत्य हैं। यही इस रात्रि का वास्तविक महत्व है और यही इसकी आध्यात्मिक महिमा। (विभूति फीचर्स)

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