मुआबज़ा बनाम कफन – कंचन श्रीवास्तव

सरकार
मुआबज़ा दे रही
उन मासूमों की जिंदगी का
जो
बेजोड़ ,बेमिसाल, अपने मां-बाप के लिए अनमोल थे।
जिनकी जिंदगी अभी शुरू ही हुई थी
जिसके सपने रंगीन सजे ही थे
ख्वाहिशें चरम पर थी
कुछ कर गुजरने की चाह
अपने से लेकर
अपनों और
अपनों से लेकर देश समाज तक के
लिए थी
ये वही बच्चे थे
जो तीन साल की उम्र से
खुद को पढ़ाई में झोक दिया था
और
जैसे-जैसे बड़े होने लगे
उनके सपने और संकल्प
पोख्ता सुदृढ़ हो रहे थे।
हिम्मत और हौसलों के साथ
आगे बढ़ने ये बच्चे
मंज़िल के करीब थे
इसी बीच
दोस्त के रूप में एक साथी मिला
और दोनों मिलकर
गुनगुनाते हुए
आगे बढ़ने लगे
नई उम्मीद,नई उमंग और नई तरंगों के साथ
हसीन सपने बुनते हुए
जिंदगी को लेकर
हसींन ख्बाब सजाते हुए
खुश थे बहुत खुश थे
बिना इसकी परवाह किये
कि लोग क्या कहेंगे।
कुछ नही
एक जुनुन था उनमें
जिंदगी को जीने का
जिसे देख के मां बाप भी खुश थे।
और फिर वैसे भी
बच्चों की खुशी में ही
मां बाप अपनी भी
खुशी जो आजकल ढूंढ रहे
इसलिए बे फिक्र थे।
हर रोज की तरह उस दिन भी
अपने अपने घरों से निकले थे
सपनों को पूरा करने
क्या पता था
जो अधूरा नाश्ता छोड़ कर
लौट कर करने को
कह गए थे
जो शाम को पापा से
किताब के लिए
पैसा देने को कहे थे
जिन बच्चियों ने
मां से लौट कर लहंगा लेने के लिए
बाजार चलने का
वादा किया था……..।
अधूरे वादे के साथ
सब विलखता उन्हें छोड़ जायेंगे।
जिनकी भरपाई निर्लज्ज सरकार
किसी अस्पताल, स्कूल , कोचिंग सेंटर के
बनने के पहले
जांच पड़ताल का वादा
करने के बजाय
लाख ,पचास हजार रुपयों से
अभिभावकों का मुंह बंद कर देगी
अरे! ये तो
जूता मारना है मुंह पर
कि देखो पैसे में इतनी ताकत है
कि हम जिंदगी तो
सुरक्षित कर नही सकते
इसलिए कफन के लिए
मुआबजा दे रहे।
क्योंकि
जिंदगी हमारे बस की बात नही हैं।
– कंचन श्रीवास्तव आरज़ू ,प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




