मनोरंजन

रंग – सविता सिंह

रंग लेना चाहती हूँ
मैं अपने ही चेहरे को,
ताकि असली रंग
मन का कोई पढ़ न ले।
अभी तो किसी ने
अपने प्रेम से
हल्के से छूकर
मुझे रंग दिया था।
न मैंने उसे माँगा,
न पूरा पाने की चाह रखी;
बस एक क्षण था
जिसे जी भी न पाई पूरी तरह।
समझ नहीं आता
मैं खुश हूँ या शून्य,
इतनी-सी ही तो अवधि थी
उस एहसास की।
कैसे कह दूँ उसे अतीत?
बस कल ही की तो बात है।
और “मेरा” कह देना
यह साहस अभी मुझमें नहीं।
इसलिए अबकी बार
सारे रंगों से रंग लूँगी खुद को,
कि भीतर जो विरह का रंग है,
वह किसी को दिखे नहीं।
अब मैं हूँ पूरी की पूरी,
अपने ही साथ,
अपने ही रंग में।
खुद को रंग डाला है मैंने,
ताकि मन का रंग
सिर्फ मेरा रहे।
– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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