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वो पहली सी मुहब्बत – ज्योत्सना जोशी

Utkarshexpress.com – बहुत दफ़ा मैं सोचती हूं कि हमें किसी को जानने की इतनी जिज्ञासा क्यों रहती है!!?

अनजान होना ज़्यादा बेहतर है शायद जानने से ,किसी को जान जाने के बाद

क्या वो वह रह पाता है जिसके लिए हम खिंचाव महसूस कर रहे थे आकर्षण भी कह सकते प्रेम कहना सही नहीं होगा हां तो मन उतना बेकल नहीं रहता ,

मानों जैसे मन कीअकुलाहट को किसी अदेखे धागे ने कस कर बांध लिया हो,

हमारी कल्पना लोक का संसार बड़ा जादुई होता है जिसमें जो भी होता है वो हमारी चाहना के तहो में सिमटा होता है, और जब वो स्वप्निल संसार यथार्थ से टकराता है तो वहम का टूट जाना लाज़िम है,

न जाने क्या समझ बैठे थे हम उसको

न जाने कहां अब छूट गये हैं

कुछ रह जाना चाहिए दरम्यान उस कुछ को जानने की तिश्नगी भी और तड़प भी, हमारे सपनों के संसार का आंखों में ठहरा रहना ज़रुरी है,

ताकि थोड़ी सी भूख बाक़ी रहे भूख चांदनी को पीने की भूख उस भाव सागर की जहां से अनगिनत मोतियों को चुन कर लाने की लालसा रहे।

साहिर पहले ही कह चुके हैं

” चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों”

लेकिन सारा मर्ज ही यही है कि दुबारा अजनबी बन जाने के बाद क्या वो पहली सी मुहब्बत यानी पहली सी बात रहेगी दूसरों का मुझे मालूम नहीं मेरे साथ ऐसा कई मर्तबा हुआ है कि मैं जान जाने के बाद ये नहीं कह पाई जितना तुमको सोचा था तुम उससे कई ज़्यादा हो जैसा कि अक्सर लोग कहते हैं मुझे हमेशा ऐसा कहीं भीतर तक लगा कि एक अव्यक्त अहसास बना रहना चाहिए था कागज़ों का हमेशा रंगा जाना ज़रूरी नहीं कभी कभी उनका कोरापन भी सब बयां करता है।        – ज्योत्स्ना जोशी, देहरादून

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