शक्ति का संयम और बुद्धि का विवेक हैं भगवान गणपति – डॉ.दीपक गोस्वामी

utkarshexpress.com – गणेश को समझना केवल एक देवता को समझना नहीं है, यह मनुष्य के भीतर छिपी उस शक्ति को समझना है जो बुद्धि को विवेक देती है, सामर्थ्य को दिशा देती है और सफलता को लोकमंगल से जोड़ती है। संसार में बुद्धिबल है, धनबल है, बाहुबल है, पदबल है और जनबल है, लेकिन इन सबका मूल्य तभी है जब इनके साथ विवेक और संतुलन हो। यही वह भाव है जिसे हम व्यापक अर्थ में गणेश बल कह सकते हैं।
बुद्धि हो और विवेक न हो तो बुद्धिमत्ता अहंकार बन सकती है। धन हो और शुचिता न हो तो संपत्ति लोभ का साधन बन सकती है। शक्ति हो और संयम न हो तो वही शक्ति हिंसा का रूप ले सकती है। गणेश का स्वरूप इन शक्तियों को संतुलित करने का सांकेतिक दर्शन प्रस्तुत करता है। इसीलिए भारतीय परंपरा में किसी शुभ कार्य के प्रारंभ में गणपति का स्मरण किया जाता है।
गणपति को अंतिम जन से जोड़कर देखना भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। गणेश की आराधना के लिए वैभव अनिवार्य नहीं है। दूर्वा जैसी सहज उपलब्ध वनस्पति और सरल श्रद्धा भी पूजा का अंग बन सकती है। गणेश पूजा की यह सरलता उस भारतीय धार्मिक चेतना को व्यक्त करती है जिसमें ईश्वर तक पहुंच का अधिकार केवल संपन्न व्यक्ति तक सीमित नहीं माना गया।
उनका वाहन मूषक भी गहरा प्रतीक प्रस्तुत करता है। मूषक छोटा है, चंचल है और अंधकार में सक्रिय रहता है। गणेश का उसके ऊपर आरूढ़ होना इस बात का संकेत है कि विशाल बुद्धि को छोटी से छोटी प्रवृत्ति पर भी नियंत्रण रखना चाहिए। मनुष्य के भीतर की वासनाएं, इच्छाएं और चंचलताएं यदि अनियंत्रित रहें तो वही उसकी सबसे बड़ी बाधा बन जाती हैं। गणेश का मूषक पर नियंत्रण आत्मसंयम का संदेश देता है।
इस दृष्टि से गणेश की पूजा केवल मंदिर की परिक्रमा नहीं, बल्कि समाज के उस व्यक्ति तक पहुंचने का संकल्प भी हो सकती है जो व्यवस्था की अंतिम पंक्ति में खड़ा है। जिसके पास साधन कम हैं, लेकिन सम्मान और अवसर पाने का अधिकार उतना ही है जितना किसी संपन्न व्यक्ति का। अंतिम जन की सेवा में जब बुद्धि, धन और श्रम लगते हैं, तभी शक्ति का वास्तविक अर्थ प्रकट होता है।
आर्थिक जीवन में गणेश का संदेश और भी महत्वपूर्ण है। गणेश को केवल धन प्राप्ति का देवता मानना उनके व्यापक प्रतीकात्मक स्वरूप को सीमित कर देना होगा। वे बुद्धि और विवेक से जुड़े देवता हैं। आर्थिक समृद्धि केवल अधिक कमाने से नहीं आती, सही निर्णय, संयमित उपभोग, दूरदृष्टि और अनुशासित संचय भी आवश्यक हैं।
लंबोदर का स्वरूप भी इसी संदर्भ में सुंदर प्रतीक बन जाता है। मनुष्य को केवल अर्जन नहीं, जीवन के अनुभवों को पचाना भी सीखना चाहिए। आलोचना को पचाना, अपमान को पचाना, सफलता को पचाना और असफलता से सीख लेना – ये सब मानसिक परिपक्वता के संकेत हैं। धन भी यदि विवेक के बिना आए तो बोझ बन सकता है। इसलिए समृद्धि का पहला आधार शुद्ध निर्णय है।
मानसिक स्तर पर गणेश का स्वरूप मनुष्य को अपने भीतर के विघ्न पहचानने की प्रेरणा देता है। भय, संशय, असुरक्षा, ईर्ष्या, क्रोध और निराशा ऐसे अदृश्य अवरोध हैं जो बाहर की किसी दीवार से अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं। गणपति को विघ्नहर्ता कहना इसीलिए अत्यंत सार्थक है। बाहरी बाधा हटाना जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण भीतर की बाधा को पहचानना है।
गणेश अथर्वशीर्ष में उन्हें मूलाधार में स्थित कहा गया है। योग परंपरा में मूलाधार को शरीर-मन की आधारभूत चेतना से जोड़ा जाता है। इसे आधुनिक मानसिक चिकित्सा का शाब्दिक पर्याय मानना उचित नहीं होगा, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से यह संदेश अत्यंत गहरा है – ऊंचाई की यात्रा आधार की स्थिरता से शुरू होती है। जिस व्यक्ति के भीतर सुरक्षा, धैर्य और आत्मविश्वास का आधार कमजोर है, उसकी ऊंची उपलब्धियां भी अस्थिर हो सकती हैं।
गणेश का शरीर स्वयं एक दृश्य दर्शन है। विशाल मस्तक व्यापक चिंतन की प्रेरणा देता है। छोटे नेत्र सूक्ष्म दृष्टि का संकेत देते हैं। बड़े कान अधिक सुनने और कम बोलने की सीख देते हैं। एकदंत त्याग और एकाग्रता का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक परंपरा में महाभारत के लेखन से उनके दंत के टूटने की कथा भी जुड़ी है। चाहे इसे धार्मिक आख्यान के रूप में देखें या प्रतीक के रूप में, संदेश यही है कि ज्ञान की साधना में सुविधा से अधिक समर्पण आवश्यक है।
गणपति की आराधना भारत की सीमाओं से बाहर भी दिखाई देती है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं में गणेश के अलग-अलग नाम और रूप मिलते हैं। जापान में कांगितेन तथा थाई परंपरा में फ्रा फिकानेत जैसे रूप इसके उदाहरण हैं। यह सांस्कृतिक विस्तार बताता है कि गणेश की छवि केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि ज्ञान, सफलता और बाधा-निवारण के व्यापक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में भी विकसित हुई।
नेतृत्व और राजनीति के स्तर पर गणपति शब्द स्वयं विचार का विषय है। गण अर्थात समूह और पति अर्थात स्वामी या अधिपति। नेतृत्व का वास्तविक अर्थ केवल आदेश देना नहीं, विविध स्वभावों और हितों वाले लोगों को एक उद्देश्य की ओर ले जाना है। जिस नेता के पास शक्ति तो हो लेकिन सुनने की क्षमता न हो, वह लंबे समय तक समाज का विश्वास नहीं रख सकता। यहीं गणेश बल की वास्तविक परीक्षा होती है। बुद्धिबल योजना बनाता है, धनबल साधन उपलब्ध कराता है, बाहुबल परिश्रम करता है और जनबल परिवर्तन को गति देता है, लेकिन इन सबको सही दिशा देने वाला विवेक बल न हो तो वही शक्तियां विनाशकारी भी हो सकती हैं।
इसलिए गणेश बल किसी चमत्कारी शक्ति का नाम नहीं, बल्कि शुभ संकल्प, शुद्ध बुद्धि, आत्मसंयम, विवेक, श्रम और लोकमंगल के समन्वय का नाम है।
आज अंतिम जन को गणेश से जोड़कर देखने का सबसे बड़ा अर्थ यही है कि हमारी बुद्धि केवल अपने लाभ के लिए न हो, हमारा धन केवल अपने उपभोग के लिए न हो और हमारा बाहुबल केवल अपनी सुरक्षा तक सीमित न रहे। यदि बुद्धि किसी भूखे के लिए समाधान खोजती है, धन किसी जरूरतमंद के जीवन में अवसर पैदा करता है और शक्ति किसी कमजोर की रक्षा में खड़ी होती है, तो वही शक्ति गणेश बल बन जाती है। गणेश हमें सिखाते हैं कि विघ्न बाहर कम और भीतर अधिक होते हैं। रास्ते की बाधा हटाना सरल है, लेकिन अहंकार, लोभ, भय और अविवेक की दीवार गिराना कठिन है। जो मनुष्य इन आंतरिक विघ्नों पर विजय पा लेता है, वही वास्तव में बलवान है। इसलिए विनायक केवल आरंभ के देवता नहीं, सही आरंभ के देवता हैं। वे केवल सफलता की कामना नहीं, सफलता की शुचिता का प्रश्न भी खड़ा करते हैं। वे केवल शक्ति नहीं, शक्ति का संयम हैं, केवल बुद्धि नहीं, बुद्धि का विवेक हैं, केवल समृद्धि नहीं, समृद्धि का लोकमंगल हैं। (विनायक फीचर्स)




