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उफ्फ़ ! महक हरश्रृंगार की – सविता सिंह

क्षीर-कोर से अंकुर जागे,
रजत-रंगत मन को त्यागे।
सुरभि-सौरभ से सिक्त पराग,
लाया आश्विन का अनुराग।
दूधिया केसर चुनर धारी,
चूमता नभ ये वसुधा प्यारी।
हरसिंगार की मखमली छुवन है,
मादक महक से मग्न पवन है।
श्वेत सारस नभ में सुहाते,
ये उल्लास मन को लुभाते।
नील गगन, नीलम सी यामिनी,
खिलने को व्याकुल चारु चाँदनी।
कर्षण करता कृष्ण-कुसुम यह,
हर लेता हर चित्त की चेतना,
मादक महक से मुग्ध मनोरथ,
मिट जाती मन की वेदना।
लौकिक नहीं यह गंध अलौकिक,
हृदय खींचता इसकी ओर,
परम पुरुष के प्रेम का पाश यह,
बाँध रहा अन्तस की छोर।
-सविता सिंह मीरा,जमशेदपुर



