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काश… तुम साथ होते (कहानी) – डॉ. सुधाकर आशावादी 

utkarshexpress.com – एक अरसे बाद पुराने शहर लौटा, तो बहुत कुछ बदला बदला सा प्रतीत हुआ। चौराहों पर चहल पहल तो थी, किन्तु दुकानदारों के चेहरे अपरिचित से लग रहे थे। कोने में चबूतरे पर पंडित नानक चंद कलाकंद की परात सजाकर बैठते थे, साथ ही सरसों के तेल और जीरे का छौंक लगा लौकी का रायता खाने के शौकीन उनकी दुकान की ओर न चाहते हुए भी कदम बढ़ा देते थे। कुछ आगे बढ़ा, अपने मुहल्ले में तो मकानों के हुलिए ही बदल चुके थे। गली का वह मकान जिसके मध्य में गैलरी थी, दाएं बाएं बैठक नुमा दो कमरे थे, भीतर खासा दालान था, पहचान में ही नहीं आया। मुख्य द्वार और दीवारें आकर्षक टाइल्स से सज्जित हो चुकी थी। यह वही घर था, जिससे मेरी अनेक यादें जुड़ी थी। एक आकर्षण था, जो बरबस मुझे उस मकान की ओर खींच कर ले जाता था।
यकायक अतीत की स्मृतियाँ मेरे इर्द गिर्द मंडराने लगी, यही वह घर था, जिसने मेरी किशोरावस्था को उड़ान देकर कल्पनाएं बुनने का अवसर प्रदान किया था। दो भाइयों की लाड़ली थी वह, जिसके साथ जीवन पथ पर संग संग चलने के सपने मैं रोज बुनता था, किन्तु उसके सम्मुख खड़ा होकर उससे मन की बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। यदा कदा सड़क पर उसे आते हुए देख भी लेता था, तो मेरी धड़कनें तेज हो जाया करती थी, मैं जैसे तैसे तेज कदमों से दाएं बाएं हो जाता था, ताकि उसका और मेरा किसी भी प्रकार से सामना न हो सके। बहरहाल वह दौर ही कुछ ऐसा था, संचार क्रांति नहीं हुई थी। कुछ बेशर्म किशोर कन्या विद्यालयों के इर्द गिर्द किसी ख़ास चेहरे को देखने और कागज पर दिल की बात लिखकर कागज की पुड़िया बनाते थे तथा उस पुड़िया को अपने सपनों की मल्लिका तक पहुँचाने का जतन किया करते थे। शर्मीलापन होने के कारण मैं इस प्रकार की गतिविधियों से दूर ही रहा, अलबत्ता एक आकर्षण था, जो मुझे किसी अन्य के प्रति आकर्षित नहीं होने देता था।
समय तेजी से बदल रहा था, उस समय कन्या का विवाह बड़ी जिम्मेदारी समझा जाता था। बेटी सत्रह बरस की हुई नहीं, कि उसके लिए योग्य वर की खोज शुरू हो जाती थी। कन्या का पिता समाज के जिम्मेदार लोगों और अपने नाते रिश्तेदारों के मध्य बैठकर कन्या के विवाह हेतु चर्चा छेड़ दिया करता था। ऐसे ही युवावस्था की ओर कदम बढ़ाते लड़कों पर विशेष निगाह रखी जाती थी। अधिकांश शादियाँ कन्या की आयु सत्रह बरस से बीस बरस के बीच तथा लड़कों की उन्नीस से चौबीस बरस तक की आयु के बीच हो जाया करती थी। जिस अवस्था में गृहस्थ का अर्थ समझने की समझ नहीं होती थी, उस आयु में गृहस्थी का बोझ डालना उस समय की व्यवस्था का अंग था। आज की तरह नहीं, कि पहले लिव इन में रहकर एक दूसरे की आदतों से परिचित होने के लिए प्रयोग करते रहो और गृहस्थ के भावनात्मक पलों को न जीकर केवल यौन स्वच्छंदता व तर्क आधारित संबंधों तक सीमित रहो। बहरहाल मेरे और सुरभि के बीच उस दौर की दीवार खड़ी थी, जिस दीवार को दोनों लांघने की हिम्मत नहीं जुटा सके। कभी ऐसा भी नहीं हुआ, कि सुरभि के सम्मुख बैठकर मैंने मन की बात कही हो। फिर भी कभी मैंने स्वयं को उससे अलग नहीं समझा। फिर भी पुरातन मान्यताओं के आधार पर दोनों की वे राहें अलग हो गई, जो यथार्थ में थी ही नहीं।
अरसा बीत गया, मैं अपनी गृहस्थी में मग्न और सुरभि भी अपनी गृहस्थी में मग्न। समय पंख लगाकर उड़ता गया। पत्रों का आदान प्रदान समाप्त होकर कब व्हाट्सएप और मैसेज बॉक्स पर ठहर गया, पता ही नहीं चला। एक दिवस मैं लाइब्रेरी में अपने पसंदीदा लेखकों की पुस्तकें खोज रहा था, कि मोबाइल घनघनाया, अंजान नंबर से कॉल थी। मैंने और उठाया, तो दूसरी ओर से आवाज आई, क्या आप मिस्टर सुमित बोल रहे हैं।
मैंने कहा – जी कहिए।
– आज आपका नंबर मिला, आपके आर्टिकल स्थानीय समाचार पत्रों में पढ़ती रहती हूँ। सोचा आज आपसे बात कर ही लूँ।
– आपने फोन किया मेरा सौभाग्य। मैंने कहा।
– मैं समझती हूँ, कि आप भी मुझे जानते हैं।
– आप कहाँ से बोल रही हैं ?
– सूरत से।
– यानी गुजरात से।
– जी मैं आजकल गुजरात में हूँ।
– मुझे समझते देर न लगी, कि यह सुरभि है। सो मैंने कहा – सुरभि।
– आखिर पहचान ही लिया।
– यह तो पता था, कि आप गुजरात में हैं, किन्तु यह नहीं जानता था, कि किस शहर में , आज यह भी जानकारी मिल गई।
– और बताओ कैसे हो ? घर परिवार में सब कैसे हैं ?
– सब अच्छे हैं, तुम बताओ, इतने दिनों बाद मेरी याद कैसे आ गई ?
– क्या तुम मुझे याद नहीं करते ? उसने प्रतिप्रश्न किया।
मैं अचकचा गया , तथापि बोलै – सो तो है।
– सच तो यह है, कि मैं तुम्हें कभी भूल नहीं पाया।
– मैं भी कब भूली हूँ।
– मुझे आज भी तुम्हारी वह छवि याद है, जब तुम अपनी किसी फ्रेंड की शादी में जा रही थी, काली बूटेदार साड़ी पहनकर। गजब की सुन्दर लग रही थी।
– हद है, इतनी पुरानी बात याद है।
– उसके बाद तुम रामपुर रही, रामपुर के बाद झाँसी। मैंने किसी से सुना था। एक बार झांसी से गुजरा, तब भी तुम्हारा स्मरण हो आया था।
– पूरे छुपे रुस्तम हो, जब इतना प्यार करते थे, तो मुझे बताया क्यों नहीं ?
– उस समय की स्थिति से तुम भी तो अपरिचित नहीं हो।
– चलो , अब क्या गिला शिकवा करें, जो नियति को मंजूर था, सो हुआ।
– बच्चे क्या कर रहे हैं ?
– बच्चे भी अपनी अपनी गृहस्थी में खुश हैं।
– और आपके ?
– वे भी अपनी अपनी गृहस्थी में मस्त है।
– अब तो यही अच्छा है, कि जो जहाँ है, वही खुश रहे, किन्तु क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता, कि यदि साथ होते, तो और अच्छा होता।
– तुम शायद ठीक कहती हो, मगर सब कुछ अपने हाथ में नहीं होता। वैसे भी अधूरापन जिंदगी का हिस्सा है।
– मान लेती हूँ , मगर कई बार यही अफसोस रहता है, कि तुम साथ होते तो कुछ और बात होती। अब किया ही क्या जा सकता है।
– काश…. ऐसा होता। इस वार्तालाप के उपरांत सुरभि ने फोन काट दिया। (विनायक फीचर्स)

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