कृत्रिम मेधा के उपयोग में सावधानी और सतर्कता जरूरी – डॉ. शैलेश शुक्ला

utkarshexpress.com – आज जिस रफ़्तार से कृत्रिम मेधा हमारे जीवन में प्रवेश कर रही है, उसे देखकर कभी-कभी लगता है जैसे हम किसी ऐसी नदी में तैर रहे हैं जिसका रुख अभी हम पूरी तरह भाँप नहीं पाए हैं। एक तरफ़ चैटबॉट कुछ ही सेकंड में निबंध लिख देते हैं, दवाओं के अणु डिज़ाइन कर देते हैं, अदालतों में पेश किए जाने वाले दस्तावेज़ तैयार कर देते हैं,दूसरी तरफ़ यही तकनीक जाली वीडियो बना रही है, नौकरियाँ खा रही है और मनगढ़ंत जानकारी को सच के रूप में परोस रही है। इन दोनों चेहरों को साथ-साथ देखने पर ही यह समझ आता है कि उत्साह जितना ज़रूरी है, सावधानी उससे भी ज़्यादा।
पहली समस्या, जो आम आदमी को सबसे ज़्यादा छूती है, वह है सच और झूठ के बीच की रेखा का धुंधला होना। कुछ महीनों पहले एक परिचित को फ़ोन आया। दूसरी तरफ़ बोलने वाले की आवाज़ उनके अपने बेटे जैसी थी,वही तुक्का, वही लहज़ा, वही मम्मी कहने का अंदाज़। आवाज़ ने कहा कि मैं फँस गया हूँ, पैसे भिजवा दो। भाग्य से दखल देरी से आया, पैसे जाने से पहले ही बात फँस गई। लेकिन हर किस्सा इतने अच्छे अंत वाला नहीं होता। आवाज़ की नकल करने वाले औज़ार अब इतने सस्ते और सुलभ हैं कि एक साधारण स्मार्टफ़ोन और दो मिनट के नमूने से कोई भी किसी की पहचान का दुरुपयोग कर सकता है। जब आँख और कान अपने ही जान-पहचान वालों पर भरोसा करने से घबराने लगें, तो समझना चाहिए कि सामाजिक विश्वास की बुनियाद हिल रही है।
इसी तरह चेहरे बदलने वाली तकनीक ने राजनीति और सेलिब्रिटी संस्कृति में एक नया अराजकता का दौर खोल दिया है। किसी नेता की आवाज़ में ऐसा बयान जारी कर देना जो उन्होंने कभी दिया ही नहीं, या किसी अभिनेता का वीडियो बनाकर उनके मुँह से ऐसे शब्द रटवा देना जो उन्होंने कभी नहीं कहे। यह सिर्फ़ शरारत नहीं, एक खतरनाक हथियार है। चुनावों के मौसम में ऐसे जाली सामग्री का असर ताबड़तोड़ फैलता है और सुधार तब तक नहीं पहुँचता जब तक नुकसान हो चुका होता है। हमारे देश जैसे विविधता वाले समाज में, जहाँ अफ़वाहें तेज़ी से भड़कती हैं, यह तकनीक उन पुरानी दरारों को और गहरा सकती है।
एक और बड़ा सवाल रोज़गार का है। अक्सर कहा जाता है कि नई तकनीक पुराने काम तो मिटाती है, पर नए भी पैदा करती है। यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि जो नए काम बनते हैं, वे उन लोगों के हाथ में नहीं आते जिनके पुराने काम छिन जाते हैं। एक बैंक में वर्षों से लिखित रिकॉर्ड सँभालने वाला क्लर्क, जिसने अपनी जवानी इसी काम में लगा दी, अब उसी काम को सँभालने वाले सॉफ़्टवेयर के आगे अप्रासंगिक होता दिखता है। उसे कहा जा रहा है कि नए कौशल सीखो। लेकिन सवाल यह है कि पैंतालीस-पचास की उम्र में, बीमार माँ-बाप और बढ़ते बच्चों के खर्च के बीच, किसी को एकदम नया काम सीखने का मन बनाना बड़ी बात है। यह एक व्यक्ति का दुख नहीं, एक पूरी पीढ़ी की बेचैनी है। जो समाज इन बेचैनियों को अनदेखा करता हैं, वे अंततः राजनीतिक और सामाजिक उलटफेर का रूप ले लेता हैं।
इन खतरों को देखते हुए यह सोचना भ्रम है कि तकनीक अपने आप संभल जाएगी। एक और बात जो अक्सर चर्चा में नहीं आती, वह है निर्णयों को स्वचालित करने का चलन। अब किसी कंपनी में किसको नौकरी मिलेगी, बैंक में किसे क़र्ज़ दिया जाएगा, अदालत में किसे ज़मानत मिलेगी, ये फ़ैसले भी बड़े हिस्से में कुछ एल्गोरिदम के हाथ में आ गए हैं। ये एल्गोरिदम पिछले आँकड़ों से सीखते हैं। लेकिन पिछले आँकड़े हमारे पूर्वाग्रहों से भरे होते हैं। अगर बीते तीस सालों में किसी ज़िले के लोगों को बैंक ने व्यवस्थित रूप से कम क़र्ज़ दिया, तो एल्गोरिदम भी उन्हीं को अयोग्य मानेगा क्योंकि उसकी समझ आँकड़ों तक सीमित है, उसे नहीं पता कि वह अयोग्यता वास्तविक थी या भेदभाव का नतीजा। इस तरह बीते के भेदभाव, भविष्य के फ़ैसलों में अदृश्य रूप से दस्तक देते रहते हैं और कोई इंसान सीधे ज़िम्मेदार न होने के कारण शिकायत का ठिकाना भी नहीं बचता। यह जवाबदेही का एक खास तरह का अंधकार है, जहाँ ग़लती तो होती है पर ग़लतीकर्ता कोई दिखता नहीं।
जानकारी के क्षेत्र में स्थिति और भी पेचीदा है। आज कई लोग अपने सवालों के जवाब उन औज़ारों से लेते हैं जो आत्मविश्वास से बोलने में माहिर हैं, भले ही उनके पास सच्चाई की गारंटी न हो। इन्हें तकनीकी भाषा में भ्रामक निर्गम कहा जाता है यानि मशीन का ऐसा बयान जो बिलकुल ग़लत हो, पर इतने सशक्त और प्रभावी अंदाज़ में कहा गया हो कि सुनने वाला यकीन कर बैठे। अगर कोई स्वास्थ्य संबंधी सलाह माँगे और उसे बताया जाए कि किसी नाम-मात्र की जड़ी-बूटी से बीमारी ठीक हो जाएगी, तो यह मामूली ग़लती नहीं है, यह किसी के जान पर बन सकती है। ऐसे मामलों में जाँच की कोई प्रक्रिया नहीं है, स्रोत का कोई संदर्भ नहीं है और बात जैसे-तैसे फैल जाती है। ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की बात तब तक अधूरी है, जब तक उस ज्ञान की सत्यता परखने का कोई तरीक़ा न हो।
यही नहीं, इन औज़ारों के पीछे कौन सा ढाँचा है, उसका स्वामित्व किसके पास है और उसे किसके हित में इस्तेमाल किया जा रहा है ,यह सवाल भी अनुत्तरित है। अधिकांश शक्तिशाली व्यवस्थाएँ कुछ ही कंपनियों के हाथ में हैं, जो अक्सर एक ही देश में बैठी हैं। उनके पास दुनिया भर के लाखों-करोड़ों लोगों का डाटा है। वह डाटा जो असल में उन लाखों-करोड़ों लोगों का है, पर उस पर नियंत्रण उन कुछ कॉर्पोरेशनों का है। यह एक नई तरह की असमानता है,ज्ञान और नियंत्रण की असमानता, जो साधनों की असमानता से भी अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह अदृश्य है।
इन खतरों को देखते हुए यह सोचना भ्रम है कि तकनीक अपने आप संभल जाएगी। निजी कंपनियाँ प्रतिस्पर्धा के दबाव में अक्सर तेज़ी से आगे बढ़ने को तरजीह देती हैं, सोचने को नहीं। इसलिए वह ढाँचा सरकारों को बनाना होगा। चाहे क़ानून हों, या उद्योग के लिए मानक लेकिन यह ढाँचा इतना कठोर भी नहीं होना चाहिए कि वह नवाचार का गला घोंट दे। संतुलन मुश्किल है, पर असंभव नहीं। इसमें तीन बातें सामने आनी चाहिए। पहली, जवाबदेही कि जब कोई निर्णय अंततः किसी इंसान के जीवन को छूता है, तो उसके पीछे कोई इंसान ज़िम्मेदार होना चाहिए, न कि मात्र एक एल्गोरिदम। दूसरी, पारदर्शिता, इसमें लोगों को यह जानने का हक है कि उनके बारे में कौन-सा निर्णय किस आधार पर लिया गया। तीसरी, समावेश यानि नियम बनाने की मेज़ पर वे आवाज़ें भी हों जो इस तकनीक का शिकार होती हैं, न कि सिर्फ़ वे जो इसे बनाती और बेचती हैं।
स्कूल और कॉलेज भी अब अपनी भूमिका पुनर्परिभाषित करने पर हैं। रटने वाली शिक्षा के दिन अब बीत गए। अब ज़रूरत उस समझ की है जो बता सके कि कौन-सी जानकारी भरोसे के क़ाबिल है और कौन-सी नहीं, किसी तर्क के पीछे क्या तर्क है और जब एक औज़ार आत्मविश्वास से कुछ कहता है तो उस पर सवाल उठाना कैसे ज़रूरी है। यह कौशल किताबों से नहीं, अभ्यास से सिखाया जा सकता है और इसे बचपन से ही शुरू करना होगा। जो पीढ़ी आज प्रश्न पूछना सीख रही है, वह कल इन औज़ारों को अपने नौकर समझेगी, अपने स्वामी नहीं।
यह सब सोचकर यह महसूस न होना चाहिए कि यह तकनीक किसी अभिशाप से कम है। दवा खोजने में, नई फ़सलें विकसित करने में, भाषाओं के बीच की दीवारें गिराने में और उन लाखों लोगों की पहुँच बढ़ाने में जिन्हें स्वास्थ्य और शिक्षा से वंचित रखा गया, इन सब में इसकी क्षमता वास्तविक है। लेकिन क्षमता और भलाई एक नहीं होते। वही औज़ार जो एक ओर बीमारी से लड़ सकता है, दूसरी ओर संदेह और भ्रम का जाल भी बुन सकता है। फ़र्क सिर्फ़ इस बात का है कि हम उसे किस ढाँचे के भीतर रखते हैं और उसके लिए कितनी सतर्कता से तैयार रहते हैं।
कृत्रिम मेधा कोई विधा नहीं है जिसे टाला जा सके और कोई आशीर्वाद नहीं जिस पर बिना सोचे हाथ फैलाए जाएँ। यह एक ऐसा औज़ार है जो इंसान को और सक्षम बना सकता है, या उसे अपनी समझ और स्वामित्व से विमुख कर सकता है। इन दोनों रास्तों के बीच का फ़ैसला तकनीक नहीं, हम लेंगे। अपनी सोच, अपने नियम और अपने लगाव के साथ। जो समाज समय रहते यह फ़ैसला ले लेता है, वह इस तकनीक का लाभ उठाता है पर जो समाज सोचने में देर कर देता है, वह उसकी कीमत चुकाता है। सावधानी भय नहीं है,सावधानी बुद्धिमानी है। और इस मोड़ पर, बुद्धिमानी से बढ़कर कोई औज़ार नहीं है। (विभूति फीचर्स)




