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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

ढू़ँढ़ता सहरा मे वो शबऩम़ रहा,

कीमती माने उसे हरदम रहा।

 

छोड़कर बेटा गया म़ात़म़ रहा,

दे ग़या आँखो मे पुर-नम़ रहा ।

 

रात दिन मेहनत बड़ी हमने करी,

वक्त हम पर मेहरबा कम कम रहा।

 

आशिक़ी उनकी ऩज़र मे आ ग़यी,

प्यार उनका हर समय मद्धम रहा।

 

रात दिन ऩज़रे तुम्हे ही ढूँढती,

हर समय बस खोज़ती आलम रहा।

 

प्यार कितना वो लुटाता जान पर,

नाम़ ज़प़ता रात दिन ज़म़ ज़म़ रहा।

 

दर्द मेरा वो भला सम़झा भी क्या,

देख़ता आँखों मे बस पुर- नम रहा

 

डूबती थी दर्द मे *ऋतु* जब बडी,

वो अ़ज़ाबो मे मेरा म़ऱहम रहा।

 

वो हिमाकत को हुऩर समझा बड़ा,

बेवज़ह कहता हमे बेग़म़ रहा।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

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