धरती का संसार – डॉ. प्रियंका सौरभ

तालाबों की प्यास में, जीवन का विस्तार।
बूंद-बूंद में बस रहा, धरती का संसार॥
बोतल वाले बेचते, पानी का व्यापार,
सूखी नदियाँ पूछतीं, कहाँ गए संस्कार।
धरती माँ की छातियाँ, कर दीं सब बीमार—
बूंद-बूंद में बस रहा, धरती का संसार॥
एसी वाले शहर ने, काट दिए सब पेड़,
फिर बादल को कोसते, सूख गए जब मेड़।
लोभ निगलता जा रहा, हरियाली का हार—
बूंद-बूंद में बस रहा, धरती का संसार॥
जोहड़-बावड़ियाँ गई, नई पढ़ाई भूल,
खोई अब तो पीढ़ियाँ, कागज़ वाले फूल।
पूर्वज की मेहनत हुई, अब केवल अखबार—
बूंद-बूंद में बस रहा, धरती का संसार॥
तालाबों पर हो रहे, महलों के निर्माण,
माटी रोती देखती, डूब रहा इंसान।
स्वार्थों की अंधी दौड़ में, सूखा हर उद्गार—
बूंद-बूंद में बस रहा, धरती का संसार॥
आज भी खरे ताल है, जीवन की पहचान,
इनसे ही मुस्कान है इनसे हिंदुस्तान।
आज बचाओ बूँद को, कल बचे परिवार—
बूंद-बूंद में बस रहा, धरती का संसार॥
– डॉ. प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार
(हरियाणा) – 125005, मोबाइल: 7015375570



