देश-विदेश

नेटवर्थ 32 करोड़, बंगले की कीमत 1260 करोड़, कर्ज 22006 करोड़, सुभाष चंद्रा प्रकरण में उठते सवाल – डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी 

utkarshexpress.com – देश के बड़े कारोबारी घरानों में कभी प्रभावशाली नाम रहे जी नेटवर्क के मालिक सुभाष चंद्रा आज एक ऐसे वित्तीय विवाद के केंद्र में हैं, जिसने देश की बैंकिंग व्यवस्था, दिवाला प्रक्रिया और बड़े कर्जदारों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला लगभग 22,006 करोड़ के दावों से जुड़ा है। हालिया NCLT प्रक्रिया में उनके खिलाफ प्रस्तुत समाधान योजना के तहत कर्जदाताओं को लगभग 6.5 करोड़ मिलने की बात सामने आई है यानी दावों की तुलना में करीब 0.03 प्रतिशत। इस फैसले पर कई बैंकों ने आपत्ति जताई है और अपील की तैयारी की है। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कर्ज कितना था और भुगतान कितना प्रस्तावित है। असली सवाल यह है कि सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति और उनकी वर्तमान नेटवर्थ का आकलन आखिर किस आधार पर किया गया?

32 करोड़ की नेटवर्थ और हजारों करोड़ का सवाल – बैंकरों ने अब इसी बिंदु पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, चंद्रा की नेटवर्थ उनके द्वारा गारंटी दिए जाने के समय बताई गई करीब 40,562 करोड़ से घटकर 2025 में लगभग 32 करोड़ रह गई। असहमति जताने वाले बैंकों ने फॉरेंसिक ऑडिट और संपत्तियों की ट्रेसिंग की मांग किए जाने का भी उल्लेख किया है।
17 जून, 2026 को खबर आई कि लुटियंस दिल्ली के भगवान दास रोड पर स्थित सुभाष चंद्रा का लगभग 2.8 एकड़ का बंगला 1,260 करोड़ में बेचने का सौदा हुआ है। यह संपत्ति उन्होंने 2015 में लगभग 304 करोड़ में खरीदी थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार खरीदार दिल्ली का एक कारोबारी परिवार है और सौदे की औपचारिकताएँ बाद की तारीख में पूरी होनी थीं। यह भारत के महंगे रिहायशी संपत्ति सौदों में गिना गया।
अब स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि जब एक अकेली संपत्ति का बाजार मूल्य ही ₹ 1,260 करोड़ के आसपास है, तब व्यक्तिगत नेटवर्थ के आकलन में केवल 32 करोड़ जैसी राशि कैसे सामने आती है? यह सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता समझने के लिए पूछा जाना चाहिए। संपत्ति है तो फिर हिसाब कहां है?
बैंकों की आपत्तियां भी इसी बिंदु को और महत्वपूर्ण बना देती हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ कर्जदाताओं ने संपत्तियों की जांच, फॉरेंसिक ऑडिट और संपत्तियों के वास्तविक स्वामित्व तथा वित्तीय लेन-देन की पड़ताल से जुड़े सवाल उठाए हैं। ऐसे में देश के सामने कुछ सीधे सवाल हैं कि यदि किसी व्यक्ति की नेटवर्थ महज 32 करोड़ आंकी जाती है, तो उसकी पूर्ववर्ती विशाल संपत्ति का क्या हुआ?
कौन-कौन सी संपत्तियां उसके नाम थीं? उनमें से कितनी संपत्तियां बेची गईं? किस कीमत पर बेची गईं?
बिक्री से प्राप्त धन का उपयोग किस तरह हुआ? क्या सभी संपत्तियों और उनसे जुड़े लेन-देन को दिवाला प्रक्रिया में पूरी तरह शामिल किया गया?
और सबसे महत्वपूर्ण 1,260 करोड़ के बंगले जैसे बड़े एसेट के सामने 32 करोड़ की नेटवर्थ का गणित क्या है?

इन सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, दस्तावेजों और स्वतंत्र जांच से मिलना चाहिए। मामला केवल एक कारोबारी का नहीं हैं। यह समझना जरूरी है कि यह विवाद केवल सुभाष चंद्रा की निजी आर्थिक स्थिति का मामला नहीं है। इसके केंद्र में वे बैंक और वित्तीय संस्थाएं भी हैं जिनके दावे हजारों करोड़ रुपये के हैं।
यदि किसी बड़े कर्ज मामले में कर्जदाताओं की वसूली नगण्य रह जाती है, तो उसका असर केवल एक कारोबारी या कुछ बैंकों तक सीमित नहीं रहता। बैंकिंग व्यवस्था में फंसा पैसा अंततः व्यापक अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की बचत तथा वित्तीय व्यवस्था से जुड़ा होता है। इसीलिए बड़े कर्जदारों के मामलों में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि दिवाला प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और संपत्तियों का वास्तविक मूल्यांकन तथा उनका पूरा लेखा-जोखा किस तरह किया जाता है।
ईमानदारी और पारदर्शिता से जांच हो, ताकि सवाल खत्म हों। NCLT का निर्णय न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और उसके खिलाफ संबंधित कर्जदाता अपील का रास्ता अपना रहे हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार यूनियन बैंक, केनरा बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाएं इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी में हैं।
इसलिए इस पूरे मामले में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले एक निष्पक्ष, स्वतंत्र और दस्तावेज-आधारित जांच जरूरी है।
जांच का उद्देश्य किसी व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं होना चाहिए। उद्देश्य यह पता लगाना होना चाहिए कि हजारों करोड़ रुपये के कर्ज के मुकाबले व्यक्तिगत संपत्ति और नेटवर्थ का वास्तविक आकलन क्या है, कौन-कौन सी संपत्तियां मौजूद थीं, उनके साथ क्या हुआ और कर्जदाताओं के हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए गए या नहीं। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 22 हजार करोड़ के दावों के सामने कुछ करोड़ रुपये की वसूली क्यों प्रस्तावित हुई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक ऐसा कारोबारी, जिसकी संपत्ति और कारोबार कभी हजारों करोड़ रुपये के स्तर पर थे, उसकी व्यक्तिगत नेटवर्थ आखिर 32 करोड़ तक कैसे पहुंची? इस सवाल का जवाब अदालत की फाइलों, संपत्तियों के दस्तावेजों और स्वतंत्र वित्तीय जांच से ही मिलना चाहिए। देश को कहानी नहीं, पूरा हिसाब चाहिए। (लेखक भागलपुर के तेजनारायण बनैली महाविद्यालय में इतिहास के विभागाध्यक्ष हैं।) (विनायक फीचर्स)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button