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प्रेम-पाती – मीनू कौशिक

 

कल्पनाओं के आँगन में मेला लगा,

भाव,  संवेदनाओं  का  रेला  लगा ।

तेरी  यादों  के  बादल  घुमड़ने  लगे,

भाव-आकाश यौवन से भरने लगा ।

चित्रमय हो गई  तेरी सुधियाँ सभी,

चित्त पर नर्तकी-सी  थिरकने लगी ।

प्रेम की  मीठी बातों  के संगीत में ,

खोई सृष्टि  मगन हो सिहरने लगी ।

चाँद-तारों  की  बारात ले  चाँदनी ,

जैसे  आँगन में  मेरे  उतरने लगी ।

तेरे किस्से  सुनाने  लगे ओस-कण ,

शांत रजनी  कहानी सुनाने लगी ।

शांत पुरवाई  इठलाके निकली तभी ,

तेरी खुशबू  को लेकर के बहने लगी ।

अंतरंग  मैं  सखी  हूँ  प्रिया  की  तेरी ,

कर शरारत  नटी  मुझसे कहने लगी ।

बाँह  पुरवाई  की  थाम  पूछा  तभी ,

याद  उसको भी  मेरी सताती  कभी ?

वेदना  से  भरी  प्रेम-पाती  लिखी ,

दिल की  गहराईयों में  डुबोकर तभी ।

मन की  सारी व्यथा  शब्द में ढल गई,

प्रेम  पाती  नहीं  आप  बीती  लिखी ।

पाओ  फुरसत  कभी  बाँच  लेना  प्रिये ,

चाँद  के  भाल  पर  रात  मैंने  लिखी ।

✍️ मीनू कौशिक ‘तेजस्विनी

 

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