फूल – रुचि मित्तल

फूल कभी शोर नहीं करते
वे अपनी मौजूदगी का ऐलान
खुशबू की धीमी रौशनी से करते हैं
वे धरती की पलकों पर रखी
नरम दुआओँ जैसे होते हैं
जिन्हें किसी मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर की ज़रूरत नहीं
सिर्फ़ एक खुला आसमान चाहिए
किसी काँटे के साथ जन्म लेकर भी
वे शिकायत दर्ज नहीं करते
बस अपनी पूरी उम्र
रंग होने की जिम्मेदारी निभाते हैं
जब हवा गुजरती है
तो वे उसके हाथ थामकर झूमते नहीं
बल्कि उसे सिखाते हैं
कैसे छूना चाहिए किसी को
बिना चोट पहुँचाए।
फूलों की पंखुड़ियों में
समय बहुत धीरे बहता है
जैसे किसी बूढ़े माली की हथेली में
बचपन ठहरा हुआ हो
वे जानते हैं
कि उन्हें तोड़ लिया जाएगा
फिर भी वे खिलते हैं
पूरी निडरता के साथ।
किसी के केशों में सजकर
वे सौंदर्य नहीं बढ़ाते
बल्कि यह याद दिलाते हैं
कि कोमल होना कमजोरी नहीं
और जब वे मुरझाते हैं
तो भी बदरंग नहीं होते
उनकी सूखी देह में
एक पूरा मौसम सोया रहता है।
फूल दरअसल
धरती का सबसे विनम्र प्रतिरोध हैं
कठोरताओं के विरुद्ध
रंग का एक शांत उद्घोष
और शायद इसी कारण
ईश्वर ने जब भी मुस्कुराना चाहा
तो पहले एक फूल बनाया।
-रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा




