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अदरक की चाय – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

सुबह की ठंडी अंगड़ाई में,
जब सूरज धीरे मुस्काता है,
मिट्टी की खुशबू संग अदरक,
मन का कोना महकाता है।
उबलते पानी की सरगम में,
दूध जैसे चाँद उतर आया,
चीनी ने मीठे बोल कहे,
इलायची ने गीत सुनाया।
हर घूँट में गर्माहट ऐसी,
जैसे माँ का कोमल आँचल,
थके हुए इन पथिक कदमों को,
दे दे फिर से नया संबल।
बरसों की जमी हुई चिंताएँ,
भाप बनकर उड़ जाती हैं,
अदरक वाली प्याली में तो,
सौ खुशियाँ मुस्काती हैं।
न कोई महफ़िल, न शहनाई,
फिर भी दिल त्योहार बने,
एक कुल्हड़ अदरक की चाय,
जीवन का श्रृंगार बने।
– राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम , छत्तीसगढ़




