अनुशासनहीनता और संवाद की कमी से जूझते मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमन्त खण्डेलवाल – पवन वर्मा

utkarshexpress.com – राजनीति में सबसे खतरनाक वह समय होता है, जब नेता के आसपास सच बोलने वाले लोग कम और प्रशंसा करने वाले अधिक हो जाते हैं। तब उपलब्धियों के शोर में कमियां दब जाती हैं और तालियों की गूंज आईने को धुंधला कर देती है। मध्य प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने अपना पहला वर्ष पूरा किया। बधाइयों और साक्षात्कारों की भरमार रही, लेकिन इन सबके बीच किसी ने यह नहीं पूछा कि इस एक वर्ष में संगठन ने क्या पाया और क्या खोया? अनुशासन, संगठनात्मक विस्तार, कार्यकर्ताओं से संवाद और सरकार-संगठन के संतुलन जैसे मुद्दों पर यदि पहला साल परखा जाए, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती, जितनी उसे दिखाने की कोशिश की गई। यही वह आईना है, जिसे सत्ता के आसपास खड़े लोग अक्सर छिपा लेते हैं।
भाजपा का प्रदेश संगठन हमेशा से ही पार्टी के भीतर अनुशासन को लेकर गंभीर रहा है। कभी किसी तरह की गुटबाजी आमतौर पर पार्टी के अंदर नहीं दिखाई देती थी, लेकिन खंडेलवाल के एक वर्ष के कार्यकाल में पार्टी में अनुशासनहीनता के मामले लगातार सामने आते रहे। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ सीधे या संकेतों में विधायकों और नेताओं के हमले लगातार होते रहे। इन हमलों से न सिर्फ पार्टी की छवि को घात लग रही है, बल्कि पार्टी इन सभी मामलों को लेकर कांग्रेस के निशाने पर भी आ गई है। यानि मध्य प्रदेश में कांग्रेस को चेतना देने का काम अब भाजपा के नेता कर रहे हैं।
हाल ही में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए कथित पत्र की जबरदस्त चर्चा रही। हालांकि विजयवर्गीय ने इस पत्र को लिखने से इंकार किया है। विजयवर्गीय ने पत्र लिखा हो या नहीं लिखा हो, लेकिन यह तो जनता के बीच में आ गया कि भाजपा की सरकार में बैठे लोगों के बीच में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। भाजपा की सरकार में सत्ता में बैठे लोगों पर नियंत्रण भी संगठन की ओर से ही होता है। हालांकि विजयवर्गीय का मामला उतना गंभीर नहीं है, जितना गुना के विधायक पन्ना लाल शाक्य का मामला है। शाक्य के निशाने पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके खेमे के मंत्री रहते हैं। डॉ. मोहन यादव के मंत्रिमंडल में सिंधिया खेमे के तुलसी राम सिलावट, गोविंद राजपूत और प्रद्युम्न सिंह तोमर हैं। पन्ना लाल शाक्य एक बार नहीं कई बार शासन और प्रशासन के खिलाफ सार्वजनिक रूप से मुखर होते रहे हैं। इसी तरह एक अन्य विधायक चिंतामणि मालवीय भी इन दिनों सुर्खियों में हैं। उन्होंने पूर्व में मीडिया से बात कर सनसनी फैला दी थी । पिछोर के विधायक प्रीतम लोधी को जैसे संगठन का कोई डर ही नहीं है। वे भी लगातार संगठन की गाईड लाइन के विपरीत जाकर आचरण और बयान देते रहते हैं। मऊगंज विधायक प्रदीप पटेल भी अपने बयान और आचरण से लगातार चर्चा में रहते हैं। रतलाम ग्रामीण के विधायक मथुरालाल डामर ने अपनी ही सरकार के मंत्री राकेश सिंह को घेर दिया। ये वे चंद उदाहरण है जो प्रदेश की राजनीति में लगातार चर्चाओं में रहे हैं।
लगातार अनुशासनहीनता के बाद भी खंडेलवाल एक साल में अनुशासन समिति नहीं बना सके। यह समिति पार्टी में अनुशासन बना रहे और यदि किसी ने अनुशासन तोड़ा तो उसके हर पहलू की जांच कर संबंधित पर कार्रवाई करने की अनुशंसा प्रदेश अध्यक्ष से करती है। इस समिति में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी दी जाती है, लेकिन पार्टी अनुशासन को लेकर सख्त रहे यह बात हेमंत खंडेलवाल को एक साल तक या तो समझ नहीं आई या उन्होंने अनुशासन को अपनी प्राथमिकता में ही नहीं रखा। दोनों ही बातें गंभीर है, जिस पार्टी को उसके अनुशासन के लिए हमेशा जाना जाता हो, उसे उससे ही दूर करने को छोटी घटना नहीं मानी जा सकती है।
खंडेलवाल के कार्यकाल में संगठनात्मक विस्तार भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं दिखा। प्रदेश कार्यकारिणी का गठन हुआ, लेकिन उसका आकार अपेक्षाकृत छोटा रखा गया। भाजपा के अनेक वरिष्ठ नेताओं और लंबे समय से काम कर रहे कार्यकर्ताओं को उसमें स्थान नहीं मिला। इससे कई नेताओं में असंतोष की चर्चा रही। जब पार्टी का लगातार विस्तार हो रहा है तब व्यापक प्रतिनिधित्व की जगह सीमित दायरे में कार्यकारिणी बना दी गई।
इसी से जुड़ा दूसरा मुद्दा कार्यसमिति में विशेष आमंत्रित सदस्यों की नियुक्ति का है। एक वर्ष बीतने के बाद भी विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची सामने नहीं आ सकी। भाजपा जैसे बड़े संगठन में यह वर्ग वरिष्ठ नेताओं, पूर्व पदाधिकारियों और अनुभवी कार्यकर्ताओं को जोड़ने का माध्यम माना जाता है। इसमें हुई देरी को भी संगठनात्मक कमजोरी के रूप में माना जा सकता है।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर का कार्यकर्ता माना जाता है। लेकिन कई जिलों से यह शिकायत सुनाई दी कि प्रदेश अध्यक्ष अभी तक अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं से व्यक्तिगत परिचय तक स्थापित नहीं कर पाए। एक बड़े कैडर आधारित दल में प्रदेश अध्यक्ष से अपेक्षा होती है कि वह लगातार जिलों का दौरा करें, पुराने कार्यकर्ताओं से संवाद बनाए और हर जिले के संगठन की नब्ज पहचान सके। इस मोर्चे पर अपेक्षित सक्रियता महसूस नहीं हुई।
एक और आलोचना यह रही कि प्रदेश अध्यक्ष का दायरा सीमित लोगों तक सिमटा दिखाई दिया। पार्टी के भीतर यह चर्चा रहती है कि वे चुनिंदा नेताओं और सलाहकारों के बीच सीमित हैं, जबकि व्यापक संगठन तक उनकी पहुंच अपेक्षाकृत कम रही। इससे कई जिलों में यह संदेश गया कि प्रदेश नेतृत्व तक हर कार्यकर्ता की पहुंच समान रूप से नहीं है।
सरकार और संगठन के बीच संतुलन भी अब एक चुनौती के रूप में सामने आ सकता है, जिस तरह से खंडेलवाल ने एक साल पूरे होने पर भोपाल के अधिकांश अखबारों को इंटरव्यू दिया, उसमें उन्होंने अपने दायरे से बाहर जाकर मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार वाले हिस्से में भी हस्तक्षेप कर दिया। उन्होंने अपने इंटरव्यू में बताया कि डॉ.मोहन यादव मंत्रिमंडल का जल्द ही विस्तार होगा। जबकि मंत्रिमंडल का विस्तार मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार रहता है। यह भी सही है कि भाजपा में संगठन से राय लेकर ही मंत्रिमंडल में फेरबदल या विस्तार होता है लेकिन सार्वजनिक रुप से ऐसा बयान देना मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण ही है। दरअसल राजनीति में संदेश शब्दों से कम और प्रस्तुति से अधिक दिया जाता है। खंडेलवाल ने मंत्रिमंडल विस्तार की बात कर यह बताने का प्रयास किया कि उनका सरकार पर भी नियंत्रण हैं। आमतौर पर प्रदेश अध्यक्ष इस तरह के बयान देने से परहेज करते है, ताकि मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार का मान रहे।
हालांकि किसी राजनीतिक दल के प्रदेश अध्यक्ष का अंतिम मूल्यांकन उनके पूरे कार्यकाल के बाद ही किया जाता है। अभी उनके पास अपनी कार्यशैली की अलग पहचान बनाने और संगठन को नई दिशा देने का समय है। लेकिन पहले वर्ष का आकलन यही संकेत देता है कि संगठन के भीतर उनकी व्यक्तिगत छाप अभी उतनी गहरी नहीं बन पाई है, जितनी भाजपा जैसे विशाल संगठन के प्रदेश अध्यक्ष से अपेक्षित होती है। (विनायक फीचर्स)




