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आज़ के बदलते  रिश्तों का सच (लेख) – रीता गुलाटी

Utkarshexpress.com – रिश्ते कभी अचानक नहीं बदलते, उन्हें बदलने में वक्त लगता है। कभी परिस्थितियाँ उन्हें बदल देती हैं, कभी स्वार्थ, कभी दूरी और कभी हमारी अपनी अपेक्षाएँ। जो रिश्ता कभी जीवन का सबसे अनमोल हिस्सा हुआ करता है, वही समय के किसी मोड़ पर औपचारिकता बनकर रह जाता है। कहते हैं, रिश्ते खून से बनते हैं और प्रेम से निभते हैं। मगर आज के समय में केवल खून का रिश्ता होना पर्याप्त नहीं रह गया। रिश्तों को समय चाहिए, संवाद चाहिए, अपनापन चाहिए और सबसे अधिक चाहिए—एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की इच्छा।

बचपन में परिवार का अर्थ था—एक साथ बैठना, एक-दूसरे की पसंद जानना, बिना कहे मन की बात समझ लेना। घर छोटा था, मगर दिल बड़े थे। त्योहार आते तो पूरा परिवार एकत्र होता। किसी एक के घर में खुशी होती तो लगता जैसे खुशी पूरे परिवार की है और किसी एक की आँख नम होती तो बाकी आँखें भी नम हो जातीं।

फिर वक्त बदला – नौकरियाँ बदलीं, शहर बदले, घर बदले और जीवन की प्राथमिकताएँ भी बदल गईं। मोबाइल ने दूर बैठे लोगों को पास तो कर दिया, मगर कई बार पास बैठे लोगों को भी दूर कर दिया। एक ही घर में रहने वाले लोग अपने-अपने संसार में व्यस्त हैं। बातचीत अब मन से कम और स्क्रीन पर अधिक होने लगी है।

आज रिश्तों में एक अजीब-सा हिसाब दिखाई देता है—

“तुमने मेरे लिए क्या किया?”

“मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।”

जहाँ कभी प्रेम बिना गणना के दिया जाता था, वहाँ अब अपेक्षाओं की एक लंबी सूची दिखाई देती है। सबसे अधिक परिवर्तन उन रिश्तों में दिखाई देता है, जहाँ उम्र के साथ व्यक्ति की उपयोगिता कम समझी जाने लगती है। जब तक माता-पिता कमाते हैं, बच्चों की जरूरतें पूरी करते हैं और परिवार के निर्णयों में सक्रिय रहते हैं, तब तक उनका महत्व बना रहता है। लेकिन जब वे वृद्ध हो जाते हैं और उन्हें सहारे की आवश्यकता पड़ती है, तब कई बार वही घर उन्हें बोझ समझने लगता है।

यह सच कड़वा है, लेकिन इसे नकारा नहीं जा सकता-  हालाँकि हर रिश्ता ऐसा नहीं होता। आज भी ऐसे बच्चे हैं जो अपने माता-पिता के लिए समय निकालते हैं, उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखते हैं और दूरी के बावजूद भावनात्मक रूप से उनके साथ खड़े रहते हैं। इसलिए समस्या पूरी पीढ़ी की नहीं, बल्कि बदलती सोच की है।

रिश्तों का एक और सच है—हम अक्सर व्यक्ति से नहीं, उसकी भूमिका से प्रेम करने लगते हैं। जब तक कोई हमारी जरूरत पूरी करता है, हमें उसका साथ अच्छा लगता है। जब उसकी भूमिका बदलती है, हमारा व्यवहार भी बदलने लगता है। पति-पत्नी के रिश्ते में भी कभी-कभी यही होता है। बीमारी, आर्थिक कठिनाई या उम्र की कमजोरी सामने आते ही प्रेम की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। सुख के साथी बहुत मिल जाते हैं, लेकिन कठिन समय में हाथ थामे रहने वाले ही रिश्ते की असली पहचान होते हैं।

वक्त रिश्तों की परीक्षा लेता है – वह यह नहीं पूछता कि आपने कितने रिश्ते बनाए; वह यह दिखाता है कि आपने कितने रिश्ते निभाए। कई बार हम अपने ही लोगों से इसलिए दूर हो जाते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि वे हमें समझें, लेकिन स्वयं उन्हें समझने की कोशिश नहीं करते। हम चाहते हैं कि वे हमारी भावनाओं का सम्मान करें, मगर उनकी भावनाओं को महत्व देना भूल जाते हैं। रिश्ते दो हाथों से ताली की तरह होते हैं—एक हाथ हमेशा आगे बढ़े और दूसरा पीछे हटता रहे, तो संबंध धीरे-धीरे मौन हो जाता है। कुछ रिश्ते समय के साथ कमजोर होते हैं और कुछ रिश्ते समय के साथ और मजबूत। अंतर केवल इतना है कि मजबूत रिश्तों में लोग एक-दूसरे को बदलने की कोशिश नहीं करते, बल्कि बदलती परिस्थितियों में एक-दूसरे का साथ देना सीखते हैं।

उम्र बढ़ने के साथ हमें रिश्तों से बहुत कुछ नहीं चाहिए होता। एक फोन, कुछ आत्मीय शब्द, थोड़ी-सी चिंता और यह एहसास कि “तुम हमारे लिए अभी भी महत्वपूर्ण हो”—कभी-कभी इतना ही पर्याप्त होता है। रिश्तों की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि लोग दूर हो जाते हैं; त्रासदी तब होती है जब लोग पास रहकर भी एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से दूर हो जाते हैं। इसलिए वक्त के साथ बदलते रिश्तों को केवल दोष देने के बजाय हमें स्वयं से भी एक प्रश्न पूछना चाहिए—

क्या हम रिश्तों को समय दे रहे हैं? क्या हम अपनों को सुन रहे हैं? क्या हम उनकी उम्र, उनकी परिस्थितियों और उनकी चुप्पी को समझ रहे हैं?

क्योंकि रिश्ते कोई वस्तु नहीं जिन्हें जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करके रख दिया जाए। रिश्ते जीवित भावनाएँ हैं। उन्हें प्रेम से सींचना पड़ता है, विश्वास से सँभालना पड़ता है और समय-समय पर अपने अहंकार से ऊपर उठकर बचाना पड़ता है। अंततः वक्त सबको बदलता है—चेहरे, परिस्थितियाँ, प्राथमिकताएँ और रिश्तों की परिभाषाएँ भी। लेकिन यदि हमारे भीतर संवेदना जीवित है, तो बदलते वक्त के बीच भी कुछ रिश्ते अपनी गरिमा बचाए रख सकते हैं।

रिश्ते उम्र से नहीं, व्यवहार से बूढ़े होते हैं – और प्रेम शब्दों से नहीं, कठिन समय में साथ खड़े रहने से साबित होता है। शायद यही वक्त के साथ बदलते रिश्तों का सबसे बड़ा सच है।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़

 

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