मनोरंजन

इबादत – प्रीति पारीक

इल्तजा है मेरी कि,कर अफवाहों को,
नजर-अंदाज कभी ,

गुनहगार की तालिम में क्या रखा है ,
बदसलूकी का आलम खत्म हो ,
कसूरवार को सजा हो कभी ना कभी,
इबादत तमाम की इस मन ने,
कोई एक इबादत उस रब की नुमाइश हो कभी।

खिलाफ उठे हजारों सवाल मेरे ,
मन की चंचलता ना हो खत्म कभी,
सुना है ,गैर भी ,हमारी गैर मौजूदगी पर ,सुकून फरमाते हैं, ,
ए खुदा उन लोगों से ना हो पहचान कभी। ,

शामिल हो हमारी खुशियां हर दिल में, ,
ना परवाना, ना शमा गमगीन हो कभी, ,
मेरे अल्फाजों को चुन–चुन समेटने से क्या होगा ,
दो पल फुर्सत से निकालो कभी।
– प्रीति पारीक, जयपुर, राजस्थान

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