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इश्क बिना हुस्न फीका – श्याम कुंवर भारती

इतनी मोहब्बत किया फिर भी तुझसे मेरे करीब आया न गया।

इश्क इतना आसमां न समाए तुझे मेरा नसीब बनाया न गया।

 

मुझसे नफरत थी या  मोहब्बत मैं समझ न पाया आज तक।

माना नफरत  ही थी  तुझे मगर मुझे शलीब चढ़ाया न गया।

 

अगर तू कहता मै खुद ही चढ़ जाता फांसी पर तुम्हारे लिए।

भरके बाहों अपनी मुझ गरीब को खुशनसीब बनाया न गया।

 

पूरी हो तेरी हर ख्वाहिश  सब किया तुम्हारी खुशी के लिए।

मर मिटा था मगर रिश्ता झूठा मुझसे अजीब बनाया न गया।

 

मालूम है मुझे तुम हुस्नगर गुल ए गुलजार बागों बहार हो मगर।

इश्क बिना हुस्न फीका दिल तोड़ मुझे बदनसीब बनाया न गया।

-श्याम कुंवर भारती, बोकारो,झारखंड

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