जन-जागरण कविता – डॉ अनमोल कुमार

सुबह की पहली किरण बोली,
चिड़ियों की चहक यूँ बोली –
पेड़ लगाओ, जल बचाओ,
पर्यावरण है अनमोल जी, प्रदूषण में ना घोल जी।
नदी रोई, पहाड़ चिल्लाया,
कचरे का ढेर जब पास आया।
धरती माँ ने दुहाई दी,
पर्यावरण है अनमोल जी, प्रदूषण में ना घोल जी।
AC की हवा तो मिल जाएगी,
पर पीपल की छाँव कहाँ से लाओगे?
ऑक्सीजन बिके बाजार में,
जब साँसों के ग्राहक बन जाओगे।
सोचो जरा, समझो जरा,
पर्यावरण है अनमोल जी, प्रदूषण में ना घोल जी।
प्लास्टिक की थैली उड़ी जो नभ में,
गाय के पेट में पहुँची पल में।
एक सुविधा की कीमत भारी,
जीवन पर बन आई बारी।
छोड़ो इसे, मोड़ो इसे,
पर्यावरण है अनमोल जी, प्रदूषण में ना घोल जी।
साइकिल चलाओ, पैदल जाओ,
तेल बचाओ, धुआँ घटाओ।
तालाब, पोखर, कुआँ बचाओ,
बूँद-बूँद से घट भरो।
बच्चों को विरासत क्या दोगे?
पर्यावरण है अनमोल जी, प्रदूषण में ना घोल जी।
संकल्प –
आओ मिलकर कसम उठाएँ,
हर घर एक पेड़ लगाएँ।
न फेंके कचरा, न जलाएँ पराली,
धरती को फिर से बनाएँ हरियाली।
यही संदेश घर-घर पहुँचाओ,
पर्यावरण है अनमोल जी, प्रदूषण में ना घोल जी।
– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, पटना, बिहार




