टूटती चूड़ियों और छूटती किताबे – डाॅ अनमोल कुमार

उसके हाथ में कलम होनी चाहिए,
पर हथौड़ा क्यों है?
उसकी उम्र कंधे पर बस्ता उठाने की,
पर ईंटें क्यों उठा रहा है?
वो ढाबे पर प्लेट धोता है,
कोई स्कूल में नाम लिखाता है।
वो पटाखे बनाता है दीवाली के,
कोई पटाखे छोड़ता है खुशियों के।
फर्क सिर्फ किस्मत का नहीं,
फर्क हमारी खामोशी का है।
आज का सच
चाय की दुकान पर “छोटू”
14 घंटे काम, 40 रुपये दाम।
भट्टे की आग में तपता बचपन,
कालीन बुनते-बुनते धुंधली आँखें।
कानून कहता है – 14 साल से कम
काम कराना जुर्म है।
पर पेट का कानून सबसे बड़ा,
भूख की अदालत में बचपन मुजरिम।
संविधान का अनुच्छेद 24 चिल्लाता है,
RTE Act किताबें बांटता है,
पर गाँव का महाजन कहता है
“पढ़ेगा तो कर्जा कौन चुकाएगा?”
बेड़ियाँ लोहे की नहीं, मजबूरी की हैं।
अब क्या करें? – हमसब
बालश्रम रुकेगा कैसे?
सिर्फ कानून से नहीं, करुणा से
सिर्फ भाषण से नहीं, शासन से
सिर्फ आँसू से नहीं एक्शन से
स्कूल बुलाओ, स्कूल भेजो
मिड-डे-मील सिर्फ भोजन नहीं,
माँ की वो थाली है जो स्कूल खींच लाती है।
“पढ़ेगा इंडिया तभी बढ़ेगा इंडिया”
नारा नहीं, नीयत बनाओ।
पेट भरो, बच्चों का
जब बाप को मनरेगा में काम मिलेगा,
तभी बेटा किताब खोलेगा।
गरीबी हटाओ का वादा
बच्चे की हथेली से छाले हटाकर निभाओ।
ग्राहक जागो, जागो
वो सस्ता कालीन खून से रंगा है,
वो चमकती चूड़ी आँसू से ढली है।
दुकानदार से पूछो – “बालश्रम मुक्त है न?”
तुम्हारा एक सवाल, उसका बचपन बचा लेगा।
समाज उठो , जागो
ढाबे पर “छोटू” दिखे तो 1098 डायल करो,
चाइल्डलाइन सिर्फ नंबर नहीं, उम्मीद है।
पंचायत तय करे – “हमारा गाँव बालश्रम मुक्त होगा”
क्योंकि कल का डॉक्टर आज भट्टे में झुलस रहा है।
नए भारत की रचना
आओ ऐसा भारत रचें
जहाँ ईंट भट्टे पर “स्कूल चलो” लिखा हो।
जहाँ होटल का मालिक खुद कहे –
“14 से कम को नौकरी नहीं, कॉपी-पेंसिल दूँगा।”
जहाँ हर अफसर गांव में पूछे –
“कितने बच्चे स्कूल से बाहर हैं?”
न कि “कितनी ईंटें बनीं?”
जहाँ सांसद की रिपोर्ट में लिखा हो –
“मेरे क्षेत्र में एक भी बाल मजदूर नहीं।”
संकल्प -मैं शपथ लेता हूँ –
न बालश्रम कराऊँगा, न होने दूँगा।
दिखे तो रोकूँगा, लिखाऊँगा, पढ़ाऊँगा।
क्योंकि एक बच्चा स्कूल में – एक अपराधी जेल से कम
एक बच्चा काम पर , पूरा देश 20 साल पीछे।
कलम की ताकत हथौड़े से बड़ी है।
किताब का बोझ ईंट से हल्का है।
बचपन बचाओगे तो भविष्य बचाओगे।
“मत छीनो उसका बचपन, उसे उड़ने दो,
आसमान किताबों का है, उसे पढ़ने दो।
देश की नींव हैं बच्चे, नींव कमजोर न करो,
बालश्रम एक अभिशाप है, अब और न सहो
बालश्रम हटाओ, देश बचाओ।
बच्चा पढ़ेगा, देश बढ़ेगा।
– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, पटना, बिहार




