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तुम्हारी तस्वीर – रुचि मित्तल

तुम्हारी तस्वीर
कोई तस्वीर नहीं लगती,
ये तो वक़्त का वो ठहराव है
जहाँ दिल भागना छोड़ देता है।
तुम्हारी आँखों में कोई दावा नहीं,
कोई शिकवा नहीं
बस एक सुकून है
जो पूछता नहीं
सीधे अपनापन बन जाता है।
तुम यूँ सामने हो
जैसे ज़िंदगी आज पहली बार
बिना शर्त मुस्कुराई हो।
न कोई अदाकारी, न कोई बनावट
बस तुम, और तुम्हारे होने से
थोड़ा बेहतर हो गया, मेरा होना।
अगर कभी थक जाऊँ
दुनिया की आवाज़ों से,
तो मुझे कुछ कहना मत
बस ऐसे ही सामने बैठ जाना,
जैसे इस तस्वीर में हो।
यक़ीन मानो,
इतना काफ़ी होगा
किसी उम्र भर के लिए।
-रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा




