मनोरंजन
धड़कन और ज़िंदगी – रुचि मित्तल

धड़कन और ज़िंदगी की दोस्ती भी कम अजीब नहीं
एक चलती है तो दूसरी साँस लेती है,
एक रुक जाए तो दूसरी ख़त्म हो जाती है।
धड़कन कहती है:-
“मैं तेरी ख़ामोशी में भी तुझसे बात करती हूँ,”
ज़िंदगी जवाब देती है:-
“मैं तेरे हर थपक में अपना वजूद ढूँढती हूँ।”
दोनों मिलकर एक ही जिस्म में
एक अदृश्य संगीत बजाती हैं
कभी तेज़, कभी धीमी,पर हमेशा साथ।
ज़िंदगी को जब डर लगता है,
धड़कन थोड़ा और तेज़ हो जाती है,
धड़कन जब थक जाती है,
ज़िंदगी उसे प्यार से थाम लेती है।
इन दोनों की यही दोस्ती है
ना दिखती, ना सुनाई देती,
फिर भी हर पल
हमारे भीतर चलती रहती है।
-रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा




