फांस – कंचन श्रीवास्तव

utkarshexpress.com – आखिर कार रवि ने अपने दीमाग से बगावत कर ही ली और मन की सुन चल पड़ा उस ओर जहां बचपन की चुलबुली यादें और ज़वानी की खट्टी मीठी बातों के साथ संघर्ष भरे दिन थे।
बचपन अपनों ,जवानी दोस्तों के साथ साथ प्यार के साथ बीच गुजारी थी ।
उसे याद आ रही बचपन की सारी बातें वो भाई बहन के साथ खेलना- कूदना, खाया पीना,, लड़ना- झगड़ा और फिर बढ़ती उम्र के साथ घर की जिम्मेदारियों में भागीदारी करना उस याद आ रहा वो पल भी जब छुटपन में बाबू जी का शौकिया हाथ बटाया करता था कभी सब्जी लाकर तो कभी पनसारी के यहाँ से समान लाकर और कभी सोते हुए बाबू जी की नींद खराब ना हो सोच कर चुपके से सुबह का दूध लाना ,उसके बाद पढ़ाई के लिए बैठ जाना और मां के नाश्ता देने पर बाबू जी का उठने के लिए इंतज़ार करना और जैसे ही वो हड़बड़ा कर उठते अरे! तुमने जगाया नही दूध लाना है तो मां गर्व से कहना अरे काहे परेशान होते है रवि ले आया फिर बाबू जी धीरे धीरे कदमों को बढ़ाते हुए मेरे पास आते और सिर पर हाथ फेरते हुए कहते जुग जुग जियो मेरे लाल ,बहुत उन्नति करोगे खूब पढ़ो जी भर पढ़ो कहके नहाने चले जाना फिर नहाकर पूजा पाठ ध्यान करके सबका एक साथ बैठ कर नाश्ता करना।
इस तरह समय कब बीतन गया पता ना चला हमारे संघर्ष के दिन पंख लगा कर उड़ गए और हम सरकारी नौकर हो गए।
मैंने देखा मां बाबू जी बहुत खुश थे बाबू जी ने तो मेरे पहले वेतन की प्रतिक्षा भी नही की और मिठाइयां बांट डाली और हमने भर भर के बड़ो का आशीर्वाद लिया।
समय बीतने लगा भाई बहन भी बड़े होने लगे और मां बाबू जी बूढ़े इस बीच हमने अपनी तमाम जिंम्मेदारियां निभाई भाई की पढ़ाई से लेकर बहन की विदाई तक मुझसे जितना हो सका सपोट किया। सब कुछ अच्छा चल रहा था पर कहते हैं ना कि जहाँ चार लोग होते है वहां सबके अपने अपने विचार होते है और ठीक भी है होने भी चाहिए पर ये मत भेद मन भेद में बदल जायेगा ये नही पता था ।बस यहाँ वही हुआ ।
इस बीच हमारी शादी हुई और कुछ समय बाद बाबू जी का देहांत हो गया। पहले तो लगा अब मुझे और जिम्मेवारी से घर को संभालना होगा पर लोगों की मनमानी और हम सब के प्रति( यानि पत्नी बच्चों के प्रति ) खराब रवैये ने हमें घर छोड़ ने पर मजबूर कर दिया। हलाकि मैं इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नही था बहुत कोशिश की कि सब कुछ बना रहे पर जब मां भी उन्हीं में शामिल हो गई तो बचाना मुश्किल हो गया। तब मैं पत्नी बच्चों सहित अपने तबादले पर चला आया और फिर फिर कभी मुड़ कर नही देखा।
ऐसा नही की जाता नही था जाता था उस शहर में मित्रों, रिश्तेदारों सबसे मिलता था पर घर नही जाता था जिसकी कशिश टीस बनके हमेशा दिल में हमेशा चुभती रहती थी ये वो फांस था जो सब खुशियों पर भारी था मेरी तमाम खुशियां उसके आगे मुझे फीकी लगती थी। लगे भी क्यों ना जिस घर ने हमें हमारा बचपन दिया हमें अपने पैरों पर खड़ा किया आज वही वर्षो से छूटा पड़ा है भला ऐसे में किसका मन लगेगा।कहते हैं तमाम रिश्ते एक तरफ और अपना घर और घर में बाट जोहती मां एक तरफ भले वो सबके साथ शामिल थी पर बाट आज भी जोहती थी शायद तभी इतनी टीस इधर भी थी।
तभी तो आज सारे गिले शिकवे ताख पर रख दीमाग को शून्य कर मन की सुनी और वर्षों पहले छोड़ आये उस घर की ओर जिसे कुछ गलतफहमियो और अपनों की मनमानियों के चलते छोड़ आया था चल पड़ा ।
सच कहूँ तो जो सुकून उसके चेहरे पर लौट कर वहां से देखने को मिल रहा उसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है बताया नही चेहरे की आभा बता रही है कि वो फांस जो दिल में वर्षों से चुभा था घर पहुंच कर मां से मिलकर निकल गया।
– कंचन श्रीवास्तव आरज़ू प्रयागराज, उत्तर प्रदेश



