बंटवारा – अवधेश कुमार झा

बांटोगे खेत-खलिहान,
जमीर कहाँ बांटोगे!
तुम बांटोगे सारी दौलत,
तकदीर कहाँ बांटोगे?
माँ-बाप का है घर भी,
माँ-बाप ने जना है!
ये जिस्म भी है उनका,
ये खून भी बना है!!
हक़ से तुम बाँट लोगे
ग़ैरों में सारी दौलत!
इक अनमोल-सी है दौलत,
वो आशीष कहाँ बांटोगे?
तुम बांटोगे
शिद्दत से पाला-पोसा,
शिद्दत से देखते हैं!
हो जान से भी प्यारा,
ऐसे सहेजते हैं!!
पर कौन काम आए
जब दिल ही टूट जाए!
भले बाँट लो जागीर,
किस्मत की लकीर कहाँ बांटोगे?
तुम बांटोगे सारी दौलत,
शायद यदि सोचते हों
माँ-बाप की कमाई,
है भाई ने ही रखा,
बेईमान मेरा भाई!
जब पूछता हूँ दिल से,
ये दर्द बढ़ रहा है,
जो तस्वीर इक बनी है,
वो तस्वीर कहाँ बांटोगे?
तुम बांटोगे सारी…
ये दर्द माँ-बाप का
हम पे न लागू होगा,
किस्सा ज़माने भर का
हम पे न लागू होगा।
इक तीर चुभ रहा है
और दर्द बढ़ गया है,
तुम दर्द बाँट लोगे,
ये तीर कहाँ बांटोगे!!
तुम बाँटोगे सारी दौलत।
बचपन में प्यार पाया,
तेरा दुलार पाया,
जब कोई भृकुटी ताने,
तुम बन रहे थे साया!
अब आज क्या हुआ है,
क्या भूल हो गई है?
भाई मेरे, बताओ,
ये पीर कहाँ बांटोगे?
तुम बांटोगे सारी दौलत।
लक्ष्मण-भरत से भाई,
फिर भी हुई लड़ाई,
रावण को मारा डाला,
विभीषण की बेवफाई!
भगवान इस जहाँ में,
भाई ही मत बनाना!
छोटा हो या बड़ा हो,
ये लकीर कहाँ बांटोगे?
तुम बांटोगे सारी दौलत।
© अवधेश कुमार झा
आचार्य — मुजफ्फरपुर (बिहार)




