बचपन की एक प्यारी-सी याद – श्री ठाकुर

ये पंक्ति यूँ ही नहीं ठहर गई मेरी रूह में,
बचपन की किसी प्यारी-सी बात ने इसे मेरी पहचान बना दिया था।
आज भी जब आईना मुस्कुराकर मेरा हाल पूछता है,
बरसों पुरानी वही आवाज़ कानों में गूँज उठती है—
“लाज़मी है तेरे चेहरे पर तिल का होना,
ख़ूबसूरत चीज़ों की पहरेदारी भी ज़रूरी है।”
ये महज़ एक तिल नहीं,
कुदरत की लिखी हुई सबसे प्यारी तहरीर थी।
चेहरे की रौनक़ तो पल भर में ढल जाती है,
मगर सादगी की चमक उम्र भर ठहर जाती है।
कुछ निशानियाँ शख़्सियत को मुकम्मल बना देती हैं,
कुछ अल्फ़ाज़ उम्र भर दिल में बसे रहते हैं।
शायद इसलिए मेरी मुस्कान में आज भी
बचपन की वही मासूमियत झलक जाती है।
आज मेरे चेहरे पर वो तिल नहीं रहा,
मगर उससे जुड़ी बातें आज भी ज़िंदा हैं।
वक़्त ने निशानी मिटा दी,
पर अल्फ़ाज़ आज भी दिल की धड़कनों में महफ़ूज़ हैं।
कुछ यादें चेहरे पर नहीं,
रूह पर लिखी होती हैं।
बचपन की वो एक तारीफ़,
आज भी मेरी सबसे ख़ूबसूरत पूँजी है।
वक़्त बदल गया, आईना बदल गया,
चेहरे का तिल भी अब नहीं रहा,
मगर वो एहसास आज भी वैसा ही है।
कुछ बातें कभी पुरानी नहीं होतीं,
वे याद बनकर नहीं,
ज़िंदगी बनकर साथ चलती हैं।
और हर बार दिल मुस्कुराकर बस यही कह उठता है—
“लाज़मी है तेरे चेहरे पर तिल का होना,
ख़ूबसूरत चीज़ों की पहरेदारी भी ज़रूरी है।”
कुछ यादें तस्वीरों में नहीं,
दिल की धड़कनों में बसती हैं।
बचपन लौटकर नहीं आता,
मगर उसकी मासूमियत उम्र भर साथ रहती है।
यही यादें ज़िंदगी की सबसे अनमोल विरासत होती हैं।
✍️ रचनाकार : श्री ठाकुर
📍 देवघर, झारखंड




