मंजूषा कला की ऐतिहासिकता एवं सांस्कृतिक विस्तार – शिवशंकर सिंह पारिजात

utkrshexpress.com – मंजूषा पुरातन काल में सोलह जनपदों में शुमार बिहार के भागलपुर और इसके आसपास के क्षेत्र की प्रमुख लोक चित्रकला है। मंजूषा के इतिहास पर गौर करें तो इसको प्रारंभिक दौर में पहचान दिलाने वाली चक्रवर्ती देवी के समय से लेकर आज तक झांपी अर्थात बॉक्स नुमा आकृति से लेकर कैनवास पर उतरने का सफ़र तय करने के बाद वर्तमान समय में मंजूषा किसी परिचय का मोहताज नहीं रह गई है। सरकारी और गैर-सरकारी गंभीर प्रयासों से आज सैकड़ों लोक कलाकार इस क्षेत्र में सक्रिय हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मधुबनी पेंटिंग की तरह बिहार की इस प्रमुख लोक चित्रकला के साथ भागलपुर को रेशमी शहर के नाम से प्रसिद्धि दिलाने वाले सिल्क उत्पादों को जी.आई. टैग मिल गया है जिसके कारण वैश्विक बाजार में इनके हस्तक्षेप की अपार संभावनाएं बढ़ गई हैं। ऐसे मुकाम पर अब यह समय आ गया है जब मंजूषा चित्रकला की विषयवस्तु को व्यापक रूप देकर इसे समृद्धि प्रदान करने पर गंभीरता से विचार किया जाय।
पारंपरिक रूप से मंजूषा चित्र-कला में बिहुला-विषहरी की लोकगाथा के प्रसंगों को चित्रित किया जाता है जो पृथ्वी लोक में पूजा प्राप्त करने हेतु भगवान शिव की मानसपुत्री सर्पों की देवी मनसा विषहरी और चंपानगर के परम शिव भक्त चांदो सौदागर के बीच संघर्ष की गाथा है जिनके बीच सती बिहुला समन्वय की अहम् भूमिका निभाती है।
लोकगाथा के मूल में भगवान शिव का स्थान अहम है। वस्तुत: अंग के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भों में इसकी प्रसिद्धि शिव-भूमि के रूप में भी है जहां की उत्तरवाहिनी गंगा तट से शिव-आराधन से संबंधित विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला का शुभारंभ होता है। इसी भूमि पर स्थित मंदार पर्वत को मथनी बनाकर पौराणिक समुद्र मंथन से निकले विष का पान पर भगवान शिव नीलकंठ कहलाये। शिव के त्रिनेत्र की ज्वाला से कामदेव के यहीं पर भस्मीभूत होने से इस भूमि का नाम अंग पड़ा।
अन्य दृष्टांतों में रामायण काल में अंग के राजा रोमपाद और अयोध्या नरेश दशरथ परम मित्र और संबंधी थे। राजा रोमपाद के सत्प्रयासों से अंग के ऋषि श्रृंगी द्वारा सम्पादित पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न करने के पश्चात् श्रीराम तथा अन्य भाईयों का जन्म हुआ। महाभारत काल में अंग के नरेश दानवीर कर्ण की गाथा से सभी परिचित हैं।
अंग और इसकी राजधानी चंपा के साथ 12 वें जैन तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य, सम्राट अशोक की माता शुभ्रदांगी, बौद्ध भिक्षुणी विशाखा, जैन शिष्या चंदनबाला, विक्रमशिला के आचार्य दीपंकर सरीखी हस्तियों के नाम जुड़े हैं जिनसे पूरी दुनिया परिचित है। गौतम बुद्ध और भगवान महावीर चंपा की गग्गरा पुष्करिणी में आकर वर्षावास किये थे।
अंगभूमि के लोक-जीवन में रचे-बसे बिहुला-विषहरी की लोकगाथा को सामान्यतः जनमानस की कपोल कल्पना मात्र समझ लिया जाता है। पर विभिन्न विद्वानों के द्वारा किये गये शोध-अध्ययनों से इस गाथा के न सिर्फ साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व आध्यात्मिक, वरन् ऐतिहासिक, पुरातात्विक, भौगोलिक तथा पर्यावरण से जुड़े पक्ष सामने आये हैं जो इसकी सत्यता के संकेत देते हैं।
ऐसे विद्वानों में एन.एल. डे (द ज्योग्राफिकल डिक्शनरी ऑफ एनशिएंट एंड मिडायवल इंडिया), आर.सी. मजूमदार (द हिस्ट्री ऑफ बंगाल), डॉ. वी.एस. वर्मा (अंतीचक एक्सावेशंस-2), डॉ. आर.सी. प्रसाद (आर्कियोलॉजी ऑफ चम्पा एंड विक्रमशिला), डॉ. आर.के. सिन्हा व डॉ. ओ.पी. पाण्डेय (मंजूषा आर्ट:रिफ्लेक्शंस इन फोक लोर, ट्रेड एंड रिजनल हिस्ट्री), डॉ. बिहारी लाल चौधरी (एन.एल. फारूकी व एस.जेड.एच. जाफरी द्वारा संपादित किताब ‘आसपेक्ट्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में संकलित ‘एक्सप्लोरिंग मिथ ऑफ बिहुला विषहरी’ शीर्षक लेख) आदि के नाम प्रमुख हैं।
अगर पुरातात्विक साक्ष्यों की बात करें, तो भागलपुर जिले में स्थित विक्रमशिला बौद्ध महाविहार (8 वीं से 12 वीं शताब्दी) की खुदाई में सर्प आकृतियों से युक्त देवी विषहरी की दो प्राचीन कलात्मक मूर्तियां मिली हैं जो प्रमाणित करती हैं कि 1000 वर्ष पहले भी अंगक्षेत्र में देवी विषहरी के पूजन की परम्परा रही होगी। इसी तरह गाथा में मुख्य स्थल के रूप में वर्णित चम्पा नगर में पटना विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के द्वारा की गई खुदाई में नाग-नागिन सहित मातृ देवियों की मूर्तियां मिली हैं। सर्प की आकृति उत्कीर्ण एक प्रस्तर स्तंभ भी मिला है जो पुरातन काल में यहाँ किसी पुराने नाग मंदिर होने का प्रमाण देता है। चम्पा और विक्रमशिला से मिली मूर्तियों व अन्य अवशेषों में अंकित नाग-घट, सर्प की आकृतियों एवं इसी तरह के अन्य चिन्हों की छाप आज भी अंग के पूजा विधानों में देखे जा सकते हैं।
हालिया शोध बताते हैं कि अंग क्षेत्र में सर्पों के पूजन-परम्परा के पीछे भौगोलिक एवं पर्यावरण संबंधी कारण भी शुमार हैं। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय का जूलॉजी विभाग अपने एक अध्ययन में बताता है कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में सांपों के पाये जाने के कारण उनके प्रकोप से मुक्त होने की कामना से यहां के लोग सर्पों की देवी मनसा व सांपों की पूजा करते है। अध्ययन के अनुसार मध्य गंगा-घाटी के इस क्षेत्र में दलदली जमीन व जंगल-झाड़ों से मानसून में बहुतायत से सांप निकलते रहते हैं। शोध बताते हैं कि इस क्षेत्र में कुल 18 प्रजातियों के सांप पाये जाते हैं जिनमें 6 अत्यंत विषैले होते हैं। बिहुला विषहरी की गाथा में बिहुला बाला की सुहागरात में विभिन्न सर्पों का बड़ा ही जीवंत वर्णन किया गया है। देवी मनसा विषहरी ने श्राप दिया था कि चांदो सौदागर के पुत्र बाला की मृत्यु सुहागरात को सर्पदंश से होगी।
मंजूषा चित्रकला के संवर्धन हेतु संजीदगी से लगे संस्थान दिशा ग्रामीण विकास मंच के संयोजन में बिहार संग्रहालय के कला-मर्मज्ञ निदेशक अशोक कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में दो दिवसीय मंजूषा कार्यशाला सह प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में मंजूषा विशेषज्ञों एवं कलाकारों ने भाग लिया। मंजूषा की बढ़ती लोकप्रियता और पहचान को अखिल भारतीय तथा वैश्विक रुप दिलाने के दृष्टिगत इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए मैंने यह सुझाव दिया कि इसमें बिहुला विषहरी की लोकगाथा के साथ अंग प्रदेश के सांस्कृतिक, पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों को भी शामिल किया जाय क्योंकि यह गाथा अंग के समृद्ध इतिहास के साथ गहराई से जुड़ी है।
अंग क्षेत्र से जुड़े उक्त प्रसंगों को मंजूषा की विषयवस्तु में समाहित करने के मेरे विचार पर सहमति व्यक्त करते हुए बिहार संग्रहालय के निदेशक अशोक कुमार सिन्हा ने कहा कि मधुबनी पेंटिंग से जुड़ी पद्मश्री बउवा देवी सरीखे कलाकारों ने सर्पों एवं मछलियों के चित्र बनाकर देश-दुनिया में ख्याति अर्जित की है। वरिष्ठ मंजूषा कलाकार उलूपी झा ने इस दिशा में कार्य करने हेतु रूचि दिखाई। (लेखक बिहार जनसंपर्क विभाग के पूर्व उपनिदेशक एवं इतिहासकार हैं) (विभूति फीचर्स)




