मनोरंजन

वर्षा ऋतु (छंद गीत)  -कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

 

धरती ओढ़े धानी चूनर, चहुँदिशि हरियाली छायी।

शुष्क पड़ी महिती पर फिर से, नवल चेतना सी आई।

देख हरीतिम सुंदर वसुधा, मन में उठे हिलोर रे।

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

 

तप्त धरा शीतल हो जाती, कूप-सरोवर भर जाते।

विविध रूप जल स्रोतों के तब, उर आनंदित करवाते।

कल-कल ध्वनि सुनकर नदियों की, मन हो भाव विभोर रे।

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

 

गिरती बूँदें पैदा करतीं, पड़-पड़ टन-टन का सरगम।

कभी करें उत्पन्न तीव्र ध्वनि, कभी ताल होती मद्धम।

आरोही-अवरोही लय सम, वर्षा धीमी-जोर रे।४

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

 

मोर-मोरनी रह-रह बोलें, प्रतिध्वनि लगती अति प्यारी।

वशीभूत हो कर पावस के, करें मिलन की तैयारी।

व्याकुलता स्वर में लगती है, ज्यों ढूढ़ें चितचोर रे।”

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

 

सूनी सेज देख कर गोरी, नित ठंडी आहें भरती।

पिय की याद सताती दिल को, हूक हृदय में तब उठती।

रात अकेले कटे न काटे, जाने कब हो भोर रे।

पावस ऋतु जब भी आती है, बादल करते शोर रे।

गर्जन तर्जन रिमझिम रिमझिम, हो वर्षा घनघोर रे।

– कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश

 

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button