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किसी का मिलना – ज्योत्स्ना जोशी

अनायास स्वाभाविक या
प्रारब्ध जैसा कुछ हो
मिलकर कुछ दूर साथ
चलना चाहना इच्छा हो
साथ चलने की पुनरावृत्ति
होना शाय़द आदत ,जरुरत
या आसक्ति हो,
लेकिन एक दूसरे के साथ चलते
रहने के बाद साथ न चलने
की स्वीकार्यता निष्ठा ,समर्पण या
श्रृद्धा है,
यह सम्भवतः प्रेम से आगे का भाव है।
– ज्योत्स्ना जोशी, देहरादून




