खुदीराम बोस :118 साल बाद भी गूंजते है जिसकी शहादत के किस्से – कुमार कृष्णन
स्वतंत्रता दिवस पर विशेष-

utkarshexpress.com – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक नेताओं, कांग्रेस के अधिवेशनों, आंदोलनों और जेल यात्राओं का इतिहास नहीं है। यह उनअसंख्य युवाओं के साहस, त्याग और बलिदान की भी कहानी है, जिन्होंने गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए अपने जीवन की सबसे सुंदर संभावनाओं को देश के नाम कर दिया। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों और बीसवीं सदी के आरंभ में भारतीय राजनीति एक निर्णायक मोड़ से गुजर रही थी। अंग्रेजी शासन की आर्थिक लूट, राजनीतिक दमन और नस्ली भेदभाव के विरुद्ध असंतोष बढ़ रहा था। 1905 में बंगाल विभाजन ने इस असंतोष को व्यापक जनचेतना में बदल दिया। स्वदेशी आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ आत्मसम्मान, स्वावलंबन और राजनीतिक स्वतंत्रता की चेतना को नई धार दी।
इसी वातावरण में युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी सामने आई, जिसके लिए देश की स्वतंत्रता व्यक्तिगत जीवन से कहीं बड़ा लक्ष्य बन गई थी। किसी ने सत्याग्रह और जनआंदोलन का रास्ता चुना, किसी ने लेखनी और पत्रकारिता को हथियार बनाया, तो किसी ने भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों का। इन रास्तों और तरीकों को लेकर इतिहास में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन युवाओं के भीतर औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की तीव्र आकांक्षा थी। इसी पीढ़ी के सबसे उज्ज्वल और मार्मिक चेहरों में एक नाम था खुदीराम बोस।
118 वर्ष बाद, 11 अगस्त की सुबह मुजफ्फरपुर की हवा में उसी इतिहास की आवाज एक बार फिर सुनाई दी। ठीक उसी समय, जब 118 वर्ष पहले युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारा में फांसी दी गई थी, आज फिर वहां देशभक्ति के स्वर गूंजे। मेदिनीपुर से आए लोग अपने साथ उनके गांव की मिट्टी और काली मंदिर का प्रसाद लेकर पहुंचे। फांसी स्थल पर उस मिट्टी से पौधा लगाया गया और श्रद्धा के साथ प्रसाद अर्पित किया गया। यह केवल श्रद्धांजलि नहीं थी यह उस ऐतिहासिक रिश्ते की पुनर्पुष्टि थी, जो मेदिनीपुर के एक किशोर और मुजफ्फरपुर की धरती के बीच शहादत ने कायम किया था।
यह दृश्य अपने आप में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उस साझी विरासत का प्रतीक है, जिसकी कोई प्रांतीय सीमा नहीं थी। खुदीराम का जन्म बंगाल में हुआ, लेकिन उनकी शहादत ने मुजफ्फरपुर को उनके जीवन का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बना दिया। इसलिए मेदिनीपुर से लाई गई मिट्टी का मुजफ्फरपुर में पहुंचना केवल भावनात्मक घटना नहीं है। यह उस राष्ट्रीय चेतना का स्मरण है, जिसमें भारत के अलग-अलग हिस्सों के लोग एक-दूसरे के संघर्ष और बलिदान को अपना मानते थे।
3 दिसंबर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले में जन्मे खुदीराम ने बचपन में ही माता-पिता को खो दिया। बड़ी बहन ने उनका पालन-पोषण किया। सामान्य परिस्थितियों में उनका जीवन भी किसी अन्य किशोर की तरह पढ़ाई, परिवार और भविष्य की योजनाओं के बीच आगे बढ़ सकता था। लेकिन जिस समय वे बड़े हो रहे थे, वह सामान्य समय नहीं था। बंगाल में राजनीतिक चेतना तेजी से फैल रही थी। स्वदेशी आंदोलन ने विद्यार्थियों और युवाओं को विशेष रूप से प्रभावित किया था।
किशोर खुदीराम भी इस वातावरण से अछूते नहीं रहे। वे राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ने लगे और धीरे-धीरे भूमिगत क्रांतिकारी संगठनों के संपर्क में आए। उन्होंने पढ़ाई छोड़कर क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता चुना। यह निर्णय आज के नजरिए से भले ही असाधारण लगे, लेकिन उस दौर के राजनीतिक वातावरण को समझे बिना इसकी व्याख्या अधूरी रहेगी।
1906 में ‘सोनार बांग्ला’ जैसे प्रतिबंधित साहित्य के वितरण के आरोप में उनकी गिरफ्तारी हुई, लेकिन वे पुलिस को चकमा देकर निकल गए। बाद में फिर गिरफ्तार हुए और चेतावनी देकर छोड़ दिए गए। अंग्रेजी पुलिस शायद उनकी उम्र को उनकी राजनीतिक समझ से बड़ी भूल समझ रही थी। जिस उम्र में अधिकांश किशोर अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, उस उम्र में खुदीराम औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देने के रास्ते पर आगे बढ़ चुके थे।
मुजफ्फरपुर ने खुदीराम के जीवन को इतिहास का स्थायी अध्याय बना दिया। ब्रिटिश अधिकारी डगलस किंग्सफोर्ड राष्ट्रवादी गतिविधियों पर कठोर दंड देने के लिए कुख्यात था। उसके न्यायिक फैसलों और राष्ट्रवादी युवाओं के प्रति कठोर रवैये के कारण क्रांतिकारी संगठन उसे औपनिवेशिक दमन के प्रतीक के रूप में देखते थे। जब उसका स्थानांतरण मुजफ्फरपुर हुआ, तो उसे निशाना बनाने की योजना बनी।
खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को इस अभियान की जिम्मेदारी दी गई। दोनों युवा मुजफ्फरपुर पहुंचे और किंग्सफोर्ड की गतिविधियों पर नजर रखने लगे। कई दिनों तक उन्होंने उसकी दिनचर्या और आने-जाने के रास्तों का निरीक्षण किया। अंततः 30 अप्रैल 1908 की रात यूरोपियन क्लब के निकट एक बग्घी को किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर उस पर बम फेंका गया लेकिन इतिहास ने इस घटना को एक दुखद मोड़ दिया। उस बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं था। उसमें दो यूरोपीय महिलाएं थीं, जिनकी मृत्यु हो गई। यह तथ्य खुदीराम के जीवन और मुजफ्फरपुर बम कांड की चर्चा में कभी छिपाया नहीं जाना चाहिए। खुदीराम का लक्ष्य किंग्सफोर्ड था, लेकिन हमले में निर्दोष लोगों की मृत्यु हुई। यही वह बिंदु है, जहां स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी अध्याय की जटिलता और त्रासदी दोनों सामने आती हैं।
इतिहास का मूल्यांकन केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं किया जा सकता। उस दौर की राजनीतिक हिंसा, औपनिवेशिक दमन और उसके विरुद्ध पैदा हुई प्रतिक्रियाओं को उनके पूरे संदर्भ में समझना जरूरी है। खुदीराम की शहादत को याद करते हुए इस त्रासद पक्ष को स्वीकार करना इतिहास के प्रति ईमानदारी भी है।
हमले के बाद अंग्रेजी शासन ने व्यापक तलाशी अभियान चलाया। खुदीराम को वैनी स्टेशन के निकट गिरफ्तार कर लिया गया। प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के प्रयास में स्वयं को गोली मार ली। खुदीराम पर मुकदमा चला और अदालत ने उन्हें मृत्यु-दंड सुनाया।
13 जून 1908 को उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया और 11 अगस्त को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दे दी गई। उनकी उम्र अठारह वर्ष से कुछ अधिक थी। यह वह उम्र है, जब जीवन सामान्यतः भविष्य की संभावनाओं से भरा होता है। लेकिन खुदीराम ने अपने समय के राजनीतिक संघर्ष में अपना जीवन समर्पित कर दिया।
समकालीन विवरणों में उनके निर्भीक व्यवहार और फांसी के तख्ते की ओर बढ़ने के साहस का उल्लेख मिलता है। यही वह क्षण था, जब अंग्रेजी शासन की दृष्टि में एक युवा अपराधी का अंत हुआ, लेकिन भारतीय जनता की स्मृति में एक शहीद का जन्म।
सत्ता ने एक शरीर को समाप्त कर दिया, लेकिन विचार और स्मृति को नहीं। खुदीराम का नाम बंगाल और बिहार से निकलकर देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचा। उनकी तस्वीरें युवाओं के बीच प्रेरणा का स्रोत बनीं। बाद के क्रांतिकारी आंदोलन में उनका नाम साहस और बलिदान के प्रतीक के रूप में लिया गया।
इतिहास की विडंबना यह है कि जिस शहर की धरती खुदीराम की शहादत की साक्षी है, उसी शहर में उनके मुकदमे से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृतियों के संरक्षण का प्रश्न आज भी उठाना पड़ रहा है। बिहार विधान परिषद सदस्य वंशीधर ब्रजवासी ने मांग की है कि मुजफ्फरपुर बम कांड से जुड़े ऐतिहासिक अदालत भवन और उस कटघरे को संरक्षित किया जाए, जहां खुदीराम ने अपने मुकदमे का सामना किया था। उनका कहना है कि वर्तमान जिला खनन कार्यालय से जुड़े इस ऐतिहासिक परिसर और कटघरे को संरक्षित करने की जरूरत है।
यह मांग केवल किसी पुराने भवन या लकड़ी के कटघरे को बचाने की मांग नहीं है। सवाल इससे कहीं बड़ा है। हम अपने स्वतंत्रता संघर्ष की भौतिक स्मृतियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? क्या इतिहास को केवल किताबों, भाषणों और सरकारी समारोहों में सीमित कर देना पर्याप्त है?
आजादी का इतिहास जेल की दीवारों में भी रहता है, अदालतों के कटघरों में भी, फांसी के तख्तों में भी और उन रास्तों में भी, जिनसे होकर शहीद आखिरी बार गुजरे थे। इसलिए मुजफ्फरपुर के उस अदालत भवन और कटघरे को संग्रहालयीय रूप देना समय की जरूरत है। वहां खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी और मुजफ्फरपुर तथा उत्तर बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ज्ञात-अज्ञात सेनानियों की स्मृतियों को एक साथ संजोया जा सकता है।
ऐसा संग्रहालय केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण नहीं होगा। वह नई पीढ़ी के लिए जीवंत इतिहास का पाठशाला बन सकता है। बच्चे किताब में पढ़ने के बजाय उस जगह को देख सकेंगे जहां एक किशोर ने औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ मुकदमा झेला था। उन्हें यह भी बताया जा सकेगा कि स्वतंत्रता संग्राम केवल एक कहानी नहीं था उसमें अहिंसक जनआंदोलन भी थे, क्रांतिकारी गतिविधियां भी थीं, किसान संघर्ष भी थे और सामाजिक जागरण भी।
देश ने आजादी का अमृत महोत्सव मनाया। उस दौरान स्वतंत्रता संग्राम की अनगिनत गुमनाम और विस्मृत कहानियों को सामने लाने की बात हुई लेकिन किसी महोत्सव की सफलता तभी मानी जाएगी, जब उसके बाद स्मृतियों को संस्थागत रूप से बचाने का काम भी हो।
आज जब मेदिनीपुर से लोग खुदीराम के गांव की मिट्टी लेकर मुजफ्फरपुर पहुंचते हैं, तो यह अपने आप में एक संदेश है। इतिहास की सीमाएं राज्य की सीमाओं से बड़ी होती हैं। मेदिनीपुर का एक किशोर मुजफ्फरपुर में शहीद हुआ और दोनों जगहों की मिट्टी एक-दूसरे की स्मृति का हिस्सा बन गई। यही भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की असली खूबसूरती है,क्षेत्र अलग हो सकते हैं, भाषाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन बलिदान की स्मृति साझा है।
फांसी स्थल पर गांव की मिट्टी से पौधा लगाया जाना भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। मिट्टी जीवन का प्रतीक है और पौधा भविष्य का। जिस जगह एक किशोर का जीवन समाप्त किया गया था, उसी स्मृति-स्थल पर एक पौधे का लगाया जाना मानो यह कहता है कि शहादत को मृत्यु के रूप में नहीं, जीवन और चेतना के रूप में देखना चाहिए।
खुदीराम बोस को याद करना केवल उनके साहस को दोहराना नहीं है। यह अपने समय से सवाल करना भी है। क्या आजादी केवल सत्ता बदलने का नाम है? क्या स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित है? क्या हम साहस, त्याग, न्याय और देश के प्रति जिम्मेदारी के उन मूल्यों को अपने सार्वजनिक जीवन में बचा पाए हैं, जिनके लिए खुदीराम जैसे युवाओं ने जीवन दे दिया?
आजादी की लड़ाई की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि नागरिक सत्ता से सवाल कर सके। अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे। समाज में अन्याय के सामने चुप न रहे। लोकतंत्र को केवल मतदान तक सीमित न समझे। खुदीराम का जीवन इन सवालों को आज भी हमारे सामने रखता है।
आज मुजफ्फरपुर में जब फिर उसी समय देशभक्ति का स्वर गूंजा, तो ऐसा लगा मानो इतिहास ने वर्तमान के दरवाजे पर दस्तक दी हो। मेदिनीपुर से आई मिट्टी, काली मंदिर का प्रसाद और फांसी स्थल पर लगाया गया पौधा केवल श्रद्धा के प्रतीक नहीं थे। वे अतीत और वर्तमान के बीच एक संवाद थे। खुदीराम की शहादत का यही सबसे बड़ा अर्थ है। शहीदों को याद करने का अर्थ केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक स्थलों, दस्तावेजों और स्मृतियों को बचाना भी है, जो आने वाली पीढ़ियों को यह बताते रहें कि आजादी मुफ्त में नहीं मिली थी। इसलिए खुदीराम को याद करना अतीत में लौटना नहीं, वर्तमान को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी स्वीकार करना है। जिस दिन हम अपने शहीदों की स्मृतियों को बचाने की जिम्मेदारी भूल जाएंगे, उसी दिन इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हमारे हाथों से छूटने लगेगा। (विभूति फीचर्स)



