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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

वो तुमसे प्यार भी करता बहुत है।
बिना तेरे कही तन्हा बहुत है।
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पसीने से हलक सूखा बहुत है,
समंदर है म़ग़र प्यासा बहुत है।
बने हैं आज दुशमन भाई भाई,
करे है आज मिल,धोखा बहुत है।
चली आयी हूँ महफिल मे तुम्हारी,
मिली रौनक लगे अच्छा बहुत है।
कमी जो जिंदगी मे है उसी की,
मिलेगा जब हमें हँसता बहुत है।
मैं लिखती खूब लिखती अब ग़ज़ल भी,
मगर लिखना मुझे भाता बहुत है।
रहेगें संग हरदम हम खुशी से,
हँसेगे यार हम,आशा बहुत है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़




