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गुरु पूर्णिमा (एक गीत) – कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

काव्य सृजन की लिए लालसा, गुरु चरणों में मैं आया।

मन के इस विस्तृत वितान पर, सप्त रंग  है बिखराया।

 

पोथी पत्रे पढ़े विविध से, क्षुधा ज्ञान की मिटी नहीं।

तारतम्य ही बैठ न पाये, कड़ियां जुड़ती और कहीं।

आज सिखा दो भाव बाँधना, आशा यह लेकर आया।

काव्य सृजन………………

 

बिंब बहुत से हृदय उभरते, रूपक में कैसे ढालूँ।

न्याय यथोचित कर पाऊंगा? संशय यह मन में पालूं।

कैसे इनको आज सहेजूँ, कोई नहीं बता पाया।

काव्य सृजन………………

 

शिल्प सुगढ़ हो प्रखर लेखनी, इसका नित अभ्यास करूँ।

एकलव्य से प्रेरित होकर, खुद ही नित अभ्यास करूँ।

कैसे साधूँ नव लेखन को, नहीं समझ में यह आया।

काव्य सृजन………………

 

कोई ऐसा गुरु मिल जाये, दीक्षा सही प्रकार करे,

सृजनात्मकता की सब त्रुटियाँ, सही समय परिहार करे,

संदीपनि वशिष्ठ ने जैसे, राम-श्याम को दिखलाया।

काव्य सृजन………………

 

काव्य सृजन की लिए लालसा, गुरुओं के द्वारे आया।

साधक बन कर सब सीखूंगा, इतना बतलाने आया।

– कर्नल प्रवीण शंकर त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश

 

 

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