मां की अलमारी (लघु कथा)

utkarshexpress.com – रीता का जीवन खुली किताब थी जिसे कोई भी पढ़ सकता था।हो भी क्यों ना ऐसा कुछ था ही नही छिपाने के लिए कि वो छिपाये।
बचपना मां संग बीता,जवानी पति संग और अब बुढ़ापा बच्चों संग इन सबके बीच हमेशा उसे एक सच्चा साथी मिलता गया जिससे वो अपनी हर बात खुल कर साझा करती गई इसलिए उसे कभी महसूस ही नही हुआ कि छिपाने जैसा कुछ है उसके पास।
क्योंकि उसे याद है वो दिन भी जब वो रोती रोती मां के पास आती तो वो सुनकर माथे को चूम धैर्य रखने को कहती और फिर उसकी समस्या हल कर देती।इस तरह बढ़ती उम्र के साथ वो अपनी बातें रितु से साझा करने लगी जो कि उसकी खास दोस्त थी।फिर कुछ समय बात उसकी शादी हो गई। यहाँ बहुत अच्छा माहौल तो नही मिला पर ठीक खाट रहा हां तब तक वो बहुत कुछ छिपाना सीख गई इसलिए उसे ज्यादा बेचैनी ना होती कि मन कहां हल्का करे।क्योंकि उसे लगा कि उसके भावनाओं की कद्र करने वाला वहां कोई नही था। इसलिए वो चुप रहने लगी पर जैसे ही वो मां बनी उसके जीवन में काफी बदलाव आया पहला तो ये कि बच्चों के साथ व्यस्त रहने लगी दूसरा बेटी के साथ सब कुछ शेयर करने लगी। धीरे धीरे वक्त कब बीतता गया बच्चे बड़े हो गए ।अब उसके पास अपनी बातों को साझा करने के लिए एक बेटी थी जिससे वो सारी बातें शेयर करने लगी। यहाँ तक की उसकी शादी हो गई फिर भी सारी बातें घर की बातें उससे करती।
ये देख बेटे बहू को बुरा भी लगता पर कुछ कर नही सकते इसलिए चुप रहे हां वो बात अलग है कि रिश्तों में थोड़ी दरार जरूर आ गई पर इसकी परवाह उसने नही कि क्योंकि उसने कभी अपनी मां को कोई गलत राय दिया ही नही ये जानते हुए भी कि पापा के ना रहने के बाद घर में सब का रवैया अच्छा नही रहा। फिर भी कोई भी बात होती तो हमेशा यही समझाती देखो रहना उन्हीं लोगों के साथ है तो थोड़ा समझ बूझ के काम लो।
छोटी मोटी बातें तो हर घर में होती रहती हैं।
पर आज जब वो चारपाई पर पड़ गई तो सब ने हाथ खींच लिया ये बात उसको सबसे ज्यादा अखरा कि जिसको सब कुछ समझी है वही आके करे। ये भावना जानते सुनते हुए भी ये नज़र अंदाज़ करती रही और उन्ही लोगों को उनकी सेवा करने दी।
पर एक दिन खबर आई मां अब हम लोगों के बीच नही रहीं ये सुन उसे तकलीफ़ तो बहुत हुई पर धैर्य रखते हुए घर गई वहां पहुंच कर उसने देखा दोनों भाई और भाभी आपस में पैसे लगाने को लेकर बहस कर रहे थे।
पर ये कुछ नही बोली उनको अपने हिसाब से करने दी।जैसे तैसे आपसी तनाव के बीच तेरहवी बीती और उसके बीतने के दूसरे दिन खराब माहौल के बीच ही ये घर चली गई।
उसके बाद जब को कोइछा भराने अच्छे दिन पर आई।
तो सभी ने टूटे मन से उसको बैठाया चाय पानी कराया और जब ये जाने लगी तो बड़ी भाभी ने ग्यारह रुपये गुड चावल से कोइछा भर दिया। पर जैसे ही ये बाहर निकलने लगी।इसने भाभी को चाबी पकड़ाई और भाई को एक लिफाफा।जिसे देख भाई भाभी कि आंखें प्रश्नवाचक निगाहों से उसे देखने लगी।
इस पर इसने कहां कुछ नही ये अलमारी की चाबी है जिसमें कुछ कैश,जेवर और नए कपड़े है जिस पर हर एक का नाम लिखा है कि किसको क्या लेना है जो कि भाभियां आपस में बांट लेगी और ये कागजात मकान और ज़मीन के जो तुम दोनों भाइयों के नाम है अपना अपना ले लो।
अब मैं चलती हूँ कहती हुई आंखों में आंसू भर सीढ़ियां उतरने लगी जब उतरने लगी तो पीछे से भाभी ने हाथ पकड़ लिया और गले से लगाते हुए बोली दीदी हम सबको मांफ कर दीजिये हमने आपको गलत समझा।
इस पर ये बोली मांफी हमसे नही उस शुद्ध आत्मा से मांगो जो निस्वार्थ हम सबके साथ रही पर अंतिम समय में उसके साथ कोई नही रहा क्योंकि उसने अपने संपत्ति के बारे में कुछ नही बताया।
सिर्फ़ हमें छोड़ कर क्योंकि मैं उसको अच्छे से समझती थी।
इसीलिए उसने सब कुछ मेरे पास रखा और कहा मेरे मरने के बाद इन लोगों को दे देना।
काश: कि जीते जी अलमारी की चाबी भाभियां संभालती तो कितना अच्छा लगता।
कहते हुए फूट फूट कर रो पड़ी।
– कंचन श्रीवास्तव आरज़ू प्रयागराज




