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गर्मी से तबाही – डॉ अनमोल कुमार

सूरज उगल रहा है अंगारे,
धरती बनी है जैसे भट्ठी सारी।
पसीने से लथपथ बदन बेचारा,
हर सांस लगती अब भारी।

पेड़ की छांव भी कांप रही है,
पंछी प्यासे बेहाल पड़े।
सड़कें तवे-सी तप रही हैं,
कदम-कदम पर फफोले जड़े।

खेतों में दरारें पड़ी हैं,
किसान की आँख में सूखा पड़ा।
बूंद-बूंद को तरसे हलक,
कुओं में भी सन्नाटा जड़ा।

बिजली गई, पंखा भी सोया,
रातें करवट बदल-बदल हारीं।
गर्म लू ने ली कितनी जानें,
खबरों में रोज वही लाचारी।

पर दोष किसका है बताओ?
जंगल काटे, हमने ही नदियां सुखाईं।
एसी की ठंडक में सोने वालों,
हमने ही तो धरती जलाई।

अब भी वक्त है संभल जाओ,
एक पेड़ लगाओ, पानी बचाओ।
वरना ये गर्मी तबाही बनेगी,
और हम इतिहास बन जाएंगे।
– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, जिला – पटना (बिहार)

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